शिव बाबा सूत्रम

1. मन पर नज़र बनाये रखना। मन के विचारों को तटस्थ भाव से यह समझकर देखना कि मैं एक आत्मा हूँ।
2. थोड़े अंतराल पर आत्म शुद्धि हेतु तत्पर होना। जिस प्रकार किसी वाहन की समय समय पर सर्विस करवानी पड़ती है। ठीक उसी प्रकार आत्म शुद्धि हेतु भी प्रयास रत रहना चाहिये।
3. दूसरों के गुण दोषों का आकलन करना छोड़कर अपने भीतर झाँकना ज्यादा आवश्यक है। शुभ देखने की आदत बनाना और अपने अंदर की बुराइयों को खोज खोज कर समाप्त करना ही शुभ कर्म है।
4. सृष्टि चक्र अनवरत चलता रहता है। मनुष्य अपने जन्म को वापस जियेगा। कर्म फल का सिद्धांत फलीभूत होता है। कर्म के फल की प्राप्ति की निश्चित अवधि नही है। पुनर्जन्म भी इसी से जुड़ा हुआ है। जो भी घटित हो रहा वो सब शुभ है, इसी विचार को धारण करके अपने आस पास व अपने साथ घटित होने वाली घटनाओं को देखना है।
5. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, ये पाँच विकार है जिनपर जय पाने हेतु निरन्तर प्रयास में लगे रहना है। ये विकार भी अपने में शुभ और अशुभ होते है। उसकी पहचान करनी है।

(प्रजापिता ब्रह्मा ईश्वरीय विश्वविद्यालय की दलसिंहसराय, समस्तीपुर, बिहार शाखा में गुरुश्री द्वारा प्रारम्भ के 5 दिनों में दिये गये ज्ञान पर आधारित)

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