अविश्वास के स्वर: प्रजापिता ब्रह्मा ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संदर्भ में
सत्य की खोज में जब आप रहते हैं तो ऐसे ऐसे प्रश्न मन में खड़े होते हैं जिनके उत्तर सहज उपलब्ध नहीं होते हैं। ऐसे में आपके आसपास का वातावरण आपको अविश्वासी या अनिश्चयात्मक बुद्धि का समझ सकता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
न जाने क्यों आज सुबह मन में ऐसी इच्छा जागी कि देखा जाए कि जिस बात पर, जिस संस्था पर, जिस विचार पर, मैं घोर विश्वास करके कदम आगे बढ़ा रहा हूँ। कहीं उसमें कोई त्रुटि और दोष तो नहीं है। इसमें मैंने गूगल पर "ब्रह्माकुमारी controversies" को सर्च किया। इस तर्ज पर मुझे जो चीजें देखने को, पढ़ने को मिली। उनको मैं मुख्य रूप में, इन बिंदुओं में देखता हूँ। पहला बिंदु, युगों की कल्पना जो ब्रह्माकुमारी दर्शन में की जाती है उस पर वैज्ञानिक शोधों, भू वैज्ञानिक तथ्यों व अवधारणाओं के आधार पर अविश्वास। दूसरा बिंदु, बाबा की आत्मा का गुलजार दीदी में आना, बाद में गुलजार दीदी की आत्मा का मोहिनी दीदी में आना इत्यादि बातों पर शंका। तीसरा बिंदु, इस दर्शन के फॉलो करने पर लौकिक संसार से धीरे-धीरे आने वाली परित्यक्तता, अरुचि।
अब इसको आप मेरा अंधविश्वास है या जो कुछ भी कह सकते हैं परंतु मैंने इस पर सोचना प्रारंभ किया तो मैंने अपने ध्यान में शिव बाबा, ब्रह्मा बाबा को ही रखा। मैंने उन्हीं से पूछा कि उनके उत्तर क्या होने चाहिए? मेरे मन में भटकाव क्यों आ रहा है? मुझे उत्तर समझ में आया है। यह मेरे उत्तर है या प्रेरणा है यह मैं नहीं कह सकता।
लेकिन इन सभी विवादित बिंदुओं पर मुझे यह लगता है की अगर हम पूरी तरह तर्क शास्त्री होकर भी हर बात की विवेचना करें। तो भी मूल रूप से हमें इस बात को ध्यान में रखना है कि हम इस संस्था में, इस समूह में, इस स्थान पर कोई भूवैज्ञानिक या पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करने नहीं आए। यह आध्यात्मिकता का, sprituality का क्षेत्र है। बाबा को एक मूल संकल्पना यह हुई कि परमपिता परमात्मा ज्योति स्वरूप हैं। हम मनुष्यों का उस से किस प्रकार का संबंध है। उस बात को, उन्होंने उन शब्दों में, उन तथ्यों के आधार पर उस वक्त के समाजिक परिस्थितियों में सामने रखा। बाबा ने कहीं यह दबाव नहीं दिया कि तुम्हें सारी की सारी बातें वैसे के वैसे मान लेनी है। उन्होंने बताया कि यह मानोगे तो तुम्हारा कल्याण है। और अगर मानने भर से आपको अपनी आध्यात्मिक उन्नति होते हुए दिख रही है तो छिद्रान्वेषण से क्या लाभ!!!!
मैं विधि का छात्र हूं। यदि मैं किसी बात को देखता हूँ तो उस रूप में देखने का प्रयत्न करता हूँ। जिस रूप में हमारे देश में विधि व्यवस्था वर्तमान है। हम देख रहे हैं भारत में एक संविधान है। उससे जुड़े हुए हजारों विधान है। जिनको सब शक्तियां संविधान से ही मिलती हैं। कभी कभी सीधे तौर पर, कभी परोक्ष तौर पर। फिर विधान समय-समय पर बदलते रहे, बनते रहे। परंतु मूल तत्व है। वह स्थिर है। उसी के इर्द-गिर्द सारी बातों का, सभी व्यवहारों का, सभी संकल्पनाओं का ताना-बाना है। यह सत्य है कि देश काल परिस्थिति के अनुसार विधि बनी और मिटाई गई। परंतु मूल तत्व वही है। यदि मैं इसको ध्यान में रखता हूँ और बाबा के मधुबन में ज्ञानवार्ता से मिलने वाले तत्व, राज-योग साधना से आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर हूँ तो मुझे बाकी सारी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
जिनको इन बातों का फर्क पड़ता है उन्हें भी फर्क क्यों पड़ रहा है यह देखना जरूरी है। क्या उन्हें लगता है कि इन बातों से संस्था के मूल उद्देश्य से विषयांतर हो रहा है या संस्था का भविष्य खतरे में है? तब भी यह प्रथम दायित्व उनका है जो संस्था में समर्पित है। हम तो पंक्षी है। शीतल जल की तलाश में आज यहाँ आ गए है। चाहेंगे कि शीतलता बनी रहे। लेकिन जैसा ब्रह्मा बाबा कहते है कि विनाश होना है सब नष्ट हो जाना है तो अगर नष्ट ही होना है तो भी क्या चिंता!!!!😊
यदि मैं तटस्थ रूप से, इस ज्ञान यज्ञ में सहभागी की भूमिका से इतर होकर भी देखूं तो मैं देखता हूं कि हमारे वर्तमान समाज में यदि कहीं पर ब्रम्हाकुमारी का सेंटर है तो इससे लाभ ही लाभ है। मुझे किसी भी प्रकार की सामाजिक हानि नहीं दिखती। मैं स्वयं बाबा के राज योग साधना, उनके आध्यात्मिक स्वरूप को ध्यान में रखकर आध्यात्मिक आनंद महसूस करता हूं।
तो अंत में, मुझे लगता है कि यदि इन तीन बातों को कोई व्यक्ति ध्यान में रखें तो सब चिंता दूर हो जायेगी:-
पहला:----- जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। इसका अर्थ है कि सतही तौर पर मूल्यांकन या विश्लेषण करने से अच्छा है कि पहले इस आध्यात्मिक आनंद के सागर में गोता लगा लिया जाए, फिर फैसला किया जाए।
दूसरा:------ गुन-अवगुन सन दोष मय विश्व कीन्ह करतार, संत हंस गुण गहही, परिहरि वारि विकार। गोस्वामी जी राम रामचरितमानस में यह कहते हैं कि ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया तो निर्माण में गुण और अवगुण दोनों ही मात्रा में पड़े हुए हैं तो हमें संत की दृष्टि हो कार्य रखना चाहिए कि संसार रूपी जल से हम दूध रूपी गुणों को अलग कर लें और जल रूपी विकारों को छोड़ दें।
तीसरा:------ ऋग्वेद में एक श्लोक है जिसका अर्थ है कि हे ईश्वर, ऐसी कृपा करो कि सभी दिशाओं से शुभ विचार मुझ तक पहुँचे।
ईश्वर की कृपा होती है तभी व्यक्ति इन स्थानों पर पहुंच पाता है। गोस्वामी जी कहते हैं बिनु सत्संग विवेक न होई राम कृपा बिनु सुलभ न सोई। बिना सत्संग के ज्ञान नहीं होता। और वह सत्संग तब तक नहीं हो पाता है जब तक परमात्मा की कृपा ना हो। तो जब परमात्मा ने, ब्रह्मा बाबा ने आपको चुन लिया है तो विश्वास करके आगे कदम बढ़ाने से ही शांति व चैतन्यता को उपलब्ध हो सकेंगे।
!!ॐ शांति!!
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प्रियदर्शी प्रतीक
दलसिंहसराय, समस्तीपुर
27.06.2022
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