नीति : व्यवस्था परिवर्तन
जीवन के किसी भी क्षेत्र में कार्य करते हुए यदि हम कुछ परिवर्तन करना चाहते हैं। यदि हम चाहते हैं की जो प्रक्रिया अथवा व्यवस्था चल रही है उसमें ऐसे परिवर्तन किए जाएं, जिनसे प्रक्रिया गत या व्यवस्था में आए हुए दोष दूर हो। यह करते हुए, तमाम शुभ इच्छाएं मन में रहते हुए भी, हमें परिवर्तन का प्रयास करते समय, यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि जो व्यवस्था विद्यमान है वह कहीं ना कहीं लोगों द्वारा, जनता द्वारा मान्य है। जनता और उस व्यवस्था के अंग, उस व्यवस्था में सहज हो चुके हैं। ऐसे में परिवर्तन हेतु अचानक से शीघ्रता पूर्वक कदम नहीं उठाने चाहिए बल्कि धीरे-धीरे व्यवस्था को नई पद्धति में जनता को नए ढंग में ढलने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।
जैसे जब कभी हम दूध उबालते हैं तो यदि दूध तेज आंच पर उबाला जाए तो जरा सा भी ध्यान भटकने पर दूध के बह जाने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। वहीं पर धीमी आंच पर दूध उबालने पर, हम पूरी तरह से यदि हम उतने सावधान न भी रहे तो दूध के बर्तन के बाहर आने की संभावना नगण्य होती है। दूध का गर्म किया जाना यदि व्यवस्था का परिवर्तन है तो आंच का तेज या कम रखा जाना हमारी तरफ से किया गया प्रयास है। आंच तेज होने पर दूध बह सकता है, ना ध्यान देने पर बर्तन व दूध जल सकता है। उसी प्रकार धीमी आंच कर देने पर भले दूध बहने की संभावना कम हो तो भी बर्तन व दूध जलने की संभावना बनी रहती है। दूध गर्म करना है ताकि वो ज्यादा समय तक ठीक बना रहे तो यह भी ध्यान रखना है कि आपने आंच कितनी रखी है, कितने स्तर की सावधानी से प्रकिया पर नजर रखनी है।
ऐसे ही व्यवस्था परिवर्तन करना है तो यह ध्यान देना है कि किस तीव्रता का परिवर्तन है, कितना असर डाल रहा है माध्यम पर, माध्यम कब तक उसको बर्दाश्त कर सकता है, कब माध्यम सीमायें तोड़ कर प्रयास को बर्बाद कर देगा।
अतः यह बात समझ आती है कि माध्यम की सीमाओं को ध्यान में रखकर, उचित रीति से धीमे धीमे किए गए सावधानी पूर्ण प्रयास से ही शुभ परिवर्तन के लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है।
!!ओम शांति!!
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प्रियदर्शी प्रतीक
14.06.2022
दलसिंहसराय
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