प्रायश्चित
आज की मुरली
17.06.2022
आज की चर्चा में प्रारंभ इस बात से हुआ कि कैसे व्यक्ति विकर्माजीत बन सकता है? विकर्माजीत, यह शब्द मेरे लिए नया है। गुरु श्री बताती हैं इसका अर्थ होता है कि अपने पाप कर्म अर्थात विकर्मों का प्रायश्चित करके उनसे मुक्त हो जाना। इस प्रायश्चित के रास्ते में कई ऐसे पड़ाव आएंगे जब तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। तो समझ लेना की हिसाब चुकता हो रहा है।
मेरे इस कथन पर कि मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन में पाप कर्म जैसा कुछ नहीं किया हुआ है। ऐसा हो सकता है कि कुछ भूल चूक हुई हो, कुछ बातें खराब हुई हो, किसी का दिल दुखा हो, परंतु कुछ भी जानबूझकर हानि पहुंचाने की दृष्टि से नहीं किया गया है। गुरु श्री कहती हैं कि जब आप ईश्वर को अपने सामने रखकर उसकी याद में, उसके ध्यान में, अपनी बातें कह रहे हैं तो आपको यह भी ध्यान में लाना होगा कि पाप कर्म या विकर्म का रूप ऐसा साधारण नहीं होगा। गुह्य रूप होगा। उदाहरण के तौर पर वह पवित्रता की चर्चा करती हैं। महाभारत की एक कथा जिसमें यह कहा गया कि एक बार वन में भ्रमण करते हुए पांडवों ने देखा की एक फल टूट कर डाली से नीचे गिरा। इस पर उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा की यह फल क्या वापस डाली पर लग सकता है? युधिष्ठिर का कहना था कि ऐसा हो सकता है लेकिन तभी जब वह व्यक्ति फल को डाली पर लगाए जो पूरी तरह से पवित्र हो। सभी पांडवों ने प्रयास किए पर सफल नहीं हुए। इस पर सब ने सोचा की द्रौपदी हर लिहाज से पवित्र है। जिसके पाँच शूरवीर पति हैं वो पतिव्रता स्त्री के अपवित्र होने का कोई कारण नहीं है। द्रौपदी ने प्रयास किया पर वह असफल हो गई। अब तो यह बड़ी बात हो गई थी। पूछने पर द्रोपदी ने कहा कि एक बार अपने घर की खिड़की पर वह खड़ी थी उस समय कर्ण रास्ते से गुजरा। उसके रूप को देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गई थी।
गुरु श्री कहती हैं कि इस तरह की बातें हमारे सब के साथ होती हैं, जिसे हम बहुत साधारण समझ कर अनदेखा कर देते हैं। हमारे समझ से वह कोई पाप कर्म नहीं है। परंतु हमें अपने कर्मों को अपने स्टैंडर्ड से नहीं मापना है, judge करना है। हमें परमात्मा के स्टैंडर्ड के हिसाब से अपने कर्मों का निर्धारण करना है।
गुरु श्री कहती हैं कर्मों को परमात्मा को अर्पित करते हुए करना चाहिए। कार्य करते समय हमारे जेहन में परमात्मा की याद रहनी चाहिए। यही वह साधारण परंतु अत्यंत गूढ़ प्रक्रिया है जिससे हम अपने विकर्मों का प्रायश्चित कर मुक्त हो सकेंगे।
प्रायश्चित के बिंदु पर सोचते हुए मुझे ध्यान में आया क्या हम ही अपने कर्मों का प्रायश्चित करते हैं या देवता भी इससे मुक्त नहीं है। जीसस क्राइस्ट की कहानी यही है कि ईश्वर ने लोगों के पापों की सजा खुद को देदी। इस समय हमारे देश में श्री काशी विश्वनाथ के मंदिर को लेकर काफी खींचतान गर्माहट बनी हुई है। मैं काशी विश्वनाथ भोले बाबा का अनन्य भक्त हूं। मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया है जैसे भी परिस्थितियों का सामना किया है वह सब बिना बाबा के सपोर्ट के, आशीर्वाद के नहीं हुआ। मुझे लगता है मेरे जीवन का एक मुख्य अभिन्न भाग बाबा है। बाबा को मैं सर्वशक्तिमान भी मानता हूं। इसमें मुझे जरा भी संदेह नहीं है। यहां मधुबन में भी शिव बाबा को ही परमात्मा का दर्जा दिया गया है।
मेरे मन में यह विचार आया है कि बाबा ने अपना मंदिर क्यों टूट जाने दिया!!! क्यों बाबा इतने दिनों तक गंदे पानी में पड़े रहे! अपने स्वरूप को क्यों नहीं लोगों तक जाहिर होने दिया!!! कहीं ऐसा तो नहीं था कि हमारे पापों का दंड बाबा ने अपने ऊपर ले लिया!!! हमारे पापों का प्रायश्चित बाबा करते रहे इतने दिनों तक!!! यह सोच कर मुझे अपार दुख हो रहा है। इससे आगे कुछ कहने सुनने लिखने की इच्छा नहीं रही।
!!ओम शांति!!
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प्रियदर्शी प्रतीक
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