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Showing posts from October, 2020

पलाश : वो पास है- वो पास थी

हसरतों की आँधियाँ थी, चाहतें बेहिसाब थी प्यार की लौ को जलाती, ख़ास वो मुलाकात थी। छोड़ संस्कारों की रवायत, बंदिशों की इंतेहा में तोड़ कर सब बेड़ियाँ, बैठी वो मेरे साथ थी। चक्रमय जीवन मे चलती, बंधनों की बिसात थी क्या जिंदगी रफ़्तार थी, या जिंदगी जज़्बात थी। कुछ पलों का साथ, फिर उम्र भर की दूरियाँ बेतकल्लुफ उमर ही थी, नासमझियां भी साथ थी। उम्मीद की नैया उतारी, साज़िशों के भंवर में दुश्वारियाँ दुनिया जहां की, प्रेमियों के साथ थी। कठपुतलियों के हाथ क्या ! विश्वास था और आस थी पर जीव के जीवनगति की लेखनी, विधि हाथ थी। प्रेम की आकुलता, और सांसारिकता की विवशता दीनता और विफलता ही प्रेमियों के हाथ थी। दुनिया की सब रवायतों का, क़ायदों का तौर था आँख में आँसू झरे, जब बिछुड़ने की बात थी। हाथ छूटा, संग टूटा और दिल टुकड़े हुआ मन हुआ था जार-जार, पर फेफड़ों में सांस थी। हाय दिल, तू फिर से उनके सामने झूठा बना बिछड़कर मर जायेंगे, क्या सिर्फ़ कोरी बात थी! आस और विश्वास, सब बस शब्द बनकर रह गये प्रेम तो अविचल रहा, पर दूरियाँ यथार्थ थी। दिवस बीते, वर्ष बीते, काल रथ बढ़ता रहा स्मृति; वन में अग्नि-सम खिलती हुई पलाश थी। सौजन्य...

क्षितिज के पार- द्वार की तलाश

क्षितिज के पार- द्वार की तलाश आस और विश्वास कि यही कहीं होगा नियंता का निवास जगत की अठखेलियाँ संसार की आवाज़ यहाँ आती होगी साफ़-साफ़ कठपुतलियों के नियंत्रण हेतु बिछाए गये तारों के सिरे होते होंगे समाप्त तो यही से करता होगा अभियंत्रण और नियंत्रण जगती के यंत्रो का तभी तो दूर देखती क्षितिज के पार करती द्वार को तलाश सोचती इन तारों में हो वो तार-जिससे बंधे हो मानव मन के व्यवहार हृदय की कंपन मन की तरंग भावनाओं की चढ़ाव-उतार हो शायद नियंता को ये आभास कि मन का नही होता यांत्रिक अभियंत्रण-नियंत्रण कही छूट रहे हो तार बिखर पड़े हो-निकल पड़े हो क्षितिज के उस पार देखती मौन हो गुनती बार बार करती बारम्बार क्षितिज के उस पार-द्वार की तलाश ----- प्रियदर्शी प्रतीक 30.10.2020

नायिका

जगत के क्षितिज के पार को निहारती आवाजो की भीड़ में मौन को खंगालती सुरमई सी आँख में स्वप्न है कई हजार भँवरे की गुंजन को संगीत में सॅवारती वो कामिनी कंचन सी-भरी बाल सुलभ चेष्टा से, व्योम के व्यक्तित्व को स्वयं में उतारती, प्रकृति के सौंदर्य का साम्य बनी नायिका, इठलाती-दुलराती, सजती-सँवारती।। ---- प्रियदर्शी प्रतीक 30.10.2020