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भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती खौफ के साये में मिचमिचाती आँखें  शोर और दर्द से पथराती आँखें  जुल्म की इंतेहा को देखकर के डर के खुलती-बंद हुई जाती आँखें देख, बर्बरता की खुशियां मनाती जाती भीड़ चीखती और चिल्लाती जाती सैकड़ों चेहरों से बनती भीड़ देखी  एक चेहरा भीड़ का अब सामने था देखने सुनने में था इंसान जैसा किंतु उसकी पाशविकता क्रूरता निर्दयी शैतान सा चेहरा बनाती  भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती कौन से आदर्श वो सिखला रहे है किस तरह के मूल्य गढ़ते जा रहे है पाशविकता क्रूरता से लबरेज जनता नृशंसता के उत्सव में डूब करके शुभ्र मानवता की खिल्ली है उड़ाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती अधर्म करती धर्म की वो आड़ लेकर मध्य युग की मूढ़ता को श्रेय देकर मौत देकर मौत का उत्सव मनाती फिर पाप को पुण्य से बेहतर दिखाकर पैरों तले इंसानियत कुचलती जाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती मज़हबी तकरीर से बेबाक होकर तालिबानी शरीयतों से लैस होकर कुफ़-कुफ़्र कुफ़्र-कुफ़्र कुफ़्र कहके  इंसानियत को मजबूर औ लाचार करके कत्ल कर हैवानियत के रंग दिखाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती वो भीड़ किस ...