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Showing posts from July, 2022

भगवान का दिया सबकुछ है

लोकल में धक्के हैं, गली में उचक्के हैं, ऑफिस में बॉस है, आती नहीं सांस है लफड़े में सब कुछ है, लेकिन भगवान का दिया सब कुछ है। महंगा बाजार है, बनावटी संसार है 99 का चक्कर है मन पूरा घनचक्कर है समझ ना आता अब कुछ है, लेकिन भगवान का दिया सब कुछ है। बढ़ता जाता टैक्स है मन होता नहीं रिलैक्स है बाहर भीड़ का रेला है भीतर मन अकेला है होता नहीं अब कुछ है, लेकिन भगवान का दिया सब कुछ है। कैसा तू इंसान है कितना तू कंपलेक्स है प्रॉब्लम से ही घिरा हुआ  लगता तेरा सब कुछ है फिर कैसे तू कह देता है कि भगवान का दिया सब कुछ है। सीने में सांस है मन में विश्वास है चल रहा दिमाग है हाथ पैर आबाद है उसकी रहमत ही सबकुछ है, इसलिये कहता हूँ कि भगवान का दिया सब कुछ है। ---- प्रियदर्शी प्रतीक 24.07.2022

आज की मुरली 20.07.2022

आज की ज्ञान वार्ता में बाबा कहते हैं कि बच्चों को तुम रूहानी से ना हो और तुम्हारे अलावा सारे विश्व की रावण से रक्षा कोई नहीं कर सकता। तुम्हें एक शुद्ध नशे में रहना है। गुरुश्री समझाती हैं कि रावण अर्थात पांच विकार जो मनुष्य को कमजोर करते हैं, उनसे मुक्त होकर, हम जो आदर्श विश्व के सामने उपस्थित करते हैं। वही आदर्श रूप, वह शक्ति है, वह स्वरूप है, जो विश्व को प्रेरणा देता है। और हमें शुद्ध नशे में रहने का अर्थ है हमें इस बात पर शुद्ध अभिमान होना चाहिए कि हम यह महान कार्य कर रहे हैं। जिस प्रकार से हम पांचों विकारों को हराकर अपने को एक आदर्श रूप में स्थापित कर रहे हैं। यह सिर्फ हमारे अपने लिए नहीं है। या हम संपूर्ण विश्व के रक्षणार्थ कर रहे हैं। मुझे लगता है जब हम अपने स्वरूप में आ रहे इस परिवर्तन को, इस नजरिए से देखना प्रारंभ कर देंगे। तो और कोई कारण नहीं होगा कि हम अपने स्वरूप से डगमगाए या विरत हो। और यह प्रक्रिया सतत चलती रहेगी। मुझे लगता है कि विश्व की रक्षा करने की बात कहने से तात्पर्य है कि विश्व जो तमाम तरह की उलझन में फंसा हुआ है। मानव जाति, मानव समाज जिस तरह की परेशानियों को महसूस ...

आज की मुरली 19.07.2022

आज के ज्ञान वार्ता में बाबा कहते हैं कि हमें कर्म से संन्यास नहीं लेना है लेकिन विकर्मों का संन्यास लेना है। इसका अर्थ है हमें कोई भी विकर्म अर्थात बुरा कर्म, गलत कर्म नहीं करना है।  बाबा कहते हैं सर्व दुखों से छूटने की सहज विधि है कि ड्रामा को अच्छी रीति बुद्धि में रखो। हर एक पाठ धारी को साक्षी होकर देखो तो दुखों से छूट जाएंगे कभी किसी बात का धक्का नहीं लगेगा। गुरुश्री समझाती हैं कि सभी प्रकार के दुखों से छूटने की विधि एक ही है। वह यह विधि है कि हर व्यक्ति को यह समझो कि वह इस दुनिया में अपना पार्ट अदा करने के लिए आया है। और हर व्यक्ति को यह समझते हुए देखो कि वो अपना पार्ट अदा कर रहा है। साक्षी भाव से देखो। तो इस प्रकार का भाव डेवलप कर लेने पर किसी की बात का धक्का नहीं लगेगा। कुछ ऐसा नहीं लगेगा कि उसने ऐसा क्यों कर दिया। हम यह समझ लेंगे कि यही उसका पाठ जो उसे करना था। बाबा संन्यास को लेकर कहते हैं कि सन्यास कभी ऐसा नहीं होना चाहिए कि कर्मों से ही सन्यास हो जाए। घर बार छोड़कर जंगल में चले गए। यह तो उचित बात नहीं हुई। कर्मों से सन्यास कोई बात नहीं हुई। कर्म करना तो इस शरीर का काम है।...

स्वधर्म-अशरीरी अवस्था- परमात्मा से योग: मुरली 14.07.2022

आज का ज्ञान वार्ता में बाबा इस बात से शुरुआत करते हैं कि बच्चे, तुम सब संग तोड़ मुझे एक परमपिता परमात्मा से योग लगाओ तो तुम सद्गति को प्राप्त होंगे। अंत में जैसी मति होगी वैसी ही गति मिलेगी। गुरुश्री समझाती हैं कि संग तोड़ना है, संग छोड़ना नहीं है। संग तोड़ना अर्थात सब व्यक्तियों से जो साथ के लोग हैं, रिश्ते हैं, मित्र हैं, उनसे किसी भी प्रकार की उम्मीद, किसी भी प्रकार की अपेक्षा को तोड़ देना है, नहीं रखना है। जो भी उम्मीद है, जो भी अपेक्षा है वह सिर्फ एक परमपिता परमात्मा से ही रखनी है। मुझे लगता है यदि इस बात को व्यक्ति अपने जीवन में धारित करले। यह धारणा बना ले तो फिर उसके लिए सारे के सारे जो दुनिया के प्रपंच है, वह हल हो जाएंगे। उसे किसी भी तरह की समस्या नहीं होगी। मैं देखता हूं कि आधी दुनिया दूसरों से अपेक्षा में परेशान है। यह अपेक्षा आवश्यक नहीं है कि सिर्फ धन की अपेक्षा हो या किसी वस्तु की अपेक्षा हो। यह अपेक्षा मान की सम्मान की प्रेम की व्यवहार की भी होती है। और अपेक्षा को ध्यान में रखकर किया गया किया गया व्यवहार कभी भी संतुलित नहीं हो सकता। उसमें एक तरफ कुछ न कुछ पाने की अपेक्षा...

आज की मुरली 09.07.2022

आज के ज्ञानवार्ता में गुरुश्री बताती हैं कि हमें एक शिव बाबा को याद रखना है किसी देहधारी को नहीं और ज्ञान के सिवाय कोई भी व्यर्थ बातें न सुननी है ना सुनानी है। उनका कहना है कि जब मिले हुए ज्ञान पर विश्वास पैदा हो गया और उसको आचरण में ले आए और उससे सुख शांति का अनुभव कर रहे, आध्यात्मिक उन्नति के सुख को महसूस कर रहे तो ऐसे में व्यर्थ बातें सुनने से कोई लाभ नहीं नहीं है। यह बातें न सिर्फ भ्रम पैदा करेंगीं बल्कि आपको मार्ग से अनावश्यक विचलित भी करेंगीं। मुझे लगता है कि यह बात तो सही है। यदि आपको कोई काम करके खुशी मिल रही है। आप महसूस करते हैं कि जिस रास्ते पर आप चल रहे हैं वह आध्यात्मिक उन्नति का रास्ता है, पतन का रास्ता नहीं है। यह आगे अच्छे, और अच्छे स्तर पर ले जाएगा। तो ऐसी स्थिति में अनावश्यक व्यर्थ विचारों को सुनना किसी भी तरह से उचित नहीं जान पड़ता है। मुझे लगता है in this information age, "Information is source of Bliss and Curse in itself too". अलग-अलग तरह के विचार, भ्रांतियां किसी भी विषय पर फैली हुई है। कई बार विभिन्न मकसद, Hidden Agenda के तहत भी भ्रांतियां, बातें, अफव...

मैं और मेरी बात

!!ओम शांति!! मुझे लग रहा है कि जब से मैं बाबा की मुरली सुन रहा हूं और उनको थोड़ा बहुत summarize करके, थोड़ा बहुत कट पेस्ट करके, थोड़ा अपनी समझ घुसा कर और बहुत ज्यादा गुरु श्री से समझ कर अपनी बातें लिख रहा हूं। तब से अभी तक मैंने कभी भी इसकी शुरुआत ओम शांति के साथ नहीं की। आज पहली बार है कि ऐसा हो रहा है। आज मैं सोचता हूं कि मैं मुरली के कंटेंट पर कुछ नहीं लिखूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं सात और आठ जुलाई दोनों दिनों की मुरली मैंने सुनी और सोचा भी था कि उस पर कुछ लिखूं लेकिन जाने क्यों ऐसा हुआ कि मैं कुछ भी नहीं लिख पाया। अब हो सकता है बाबा जैसा कहते है कि इस ड्रामे का यह पार्ट भी नुंधा हुआ है। आज मैं कुछ रेंडम लिखना चाहता हूं। इतने दिन तक मधुबन में आ जा कर, ज्ञान वार्ता में शामिल होकर, योग की प्रक्रिया करने पर, यह तो निश्चित है कि कुछ ऐसे परिवर्तन आए हैं कुछ ऐसे चेंज दिख रहे हैं, जो सच में पॉजिटिव है। पॉजिटिव शब्द अपने आप में तुलनात्मक अध्ययन का निचोड़ दिखलाता है। पॉजिटिव मतलब जीवन को जैसा होना चाहिए, जो एक मान्यता है। आदमी की जिंदगी में जो चीजें होनी चाहिए, जैसी मान्यताएं हैं। उन मान्यता...

आज की मुरली 06.07.2022

आज के ज्ञान वार्ता में गुरु श्री बताती हैं कि अपने आत्म स्वरूप को समझ लेना और परमात्मा से उसके संबंध को जानकर उनकी याद में रहना, यह जीवन मुक्ति का वह मार्ग है, जो समझ में आ जाए तो सेकंड भर में जीवन मुक्ति के द्वार खुल जाते हैं। बाबा कहते हैं की मांगना नहीं है। कभी भी मांगने के लिए हाथ नहीं फैलाना है। मुझे लगता है की जब हमें यह ज्ञान हो गया कि हम परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। तो मांगने का उपक्रम अपने विश्वास को खोखला करने जैसा है। बाबा आगे बताते हैं की एक और कर्तव्य ज्ञान प्राप्ति के पश्चात निश्चित हो जाता है। वह कर्तव्य है सभी को इस कल्याणकारी प्रक्रिया से अवगत कराना। सच्ची सेवा तभी होगी जब हम इस ज्ञान की सुगंधी को चारों ओर बिखेर देंगे। गुरु श्री कहती हैं कि हमें सिर्फ यह नहीं करना है कि मुरली सुन ली सुन के घर चले गए, उसके बाद अगला दिन बिताया फिर आए फिर सुन ली और चल दिये। मुरली के वचन, जो बातें सामने आई, उन पर मनन करना और इन बातों को और लोगों तक पहुंचाना भी हमारा दायित्व है। गुरुश्री कहती हैं कि हमें प्रयोगी बनना होगा प्रयोगी से तात्पर्य है जो योग द्वारा रचित इस ज्ञान को निरंतर अपने प...

आज की मुरली 05.07.2022

आज की मुरली में बाबा कहते है कि “मीठे बच्चे - अमृतवेले उठ बाप की याद का घृत रोज़ डालो, तो आत्मा रूपी ज्योति सदा जगी रहेगी''। गुरुश्री कहती हैं कि अमृतवेला अर्थात सुबह 4:00 बजे उठना हर रीति से लाभकारी है। यह स्वास्थ्य के लिहाज से और आध्यात्म के लिहाज से दोनों ही प्रकार से हमारे लिए लाभदायक व्यवस्था है। गुरुश्री बताती हैं कि युगों के परिवर्तन में सबसे अच्छा समय अर्थात सतयुग आने वाला है। यह उसी प्रकार से है जैसे रात के बाद दिन होने वाला है। मुझे लगता है सुबह उठकर परमात्मा को याद करना इसलिए हर प्रकार से अच्छा हो सकता है क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शांत होता है। ऐसे शांत समय में, जो विचार हमारे मन मस्तिष्क में रहता है वह न सिर्फ हमारी आत्मा को बल्कि हमारे पूरे वातावरण को प्रभावित करता है। परमात्मा का मनन चिंतन ऐसा विचार है जो हमें पवित्रता का बोध करा सकता है। और हमारे पूरे दिन को शुभ बनाने की शक्ति रखता है। हम यदि ध्यान दे तो पाएंगे कि अगर सुबह सुबह हमारी जुबान पर कोई गाना, गीत चढ़ जाता है तो दिन भर उसकी अनुगूंज कहीं ना कहीं कानों में सुनाई पड़ती रहती है। सुबह को हम जो भी पहला काम क...

पवित्रता, ब्रह्मचर्य, प्रेम और परमात्मा

ब्रह्मा बाबा ने अपनी मुरली में एवं गुरुश्री ने इस बात पर ने भी समय-समय पर पवित्रता और ब्रह्मचर्य पर बहुत जोर दिया है। मैं सोचता हूँ कि क्या पवित्रता को स्वच्छता से मिला कर नहीं देख सकते? परन्तु लगता है कि स्वच्छता में जब ब्रह्मचर्य जुड़ जाता होगा तब पवित्रता उदित होती होगी। स्वच्छता से यहां संदर्भ सिर्फ शारीरिक स्वच्छता का नहीं बल्कि मानसिक स्वच्छता का भी है। ब्रम्हचर्य की महत्ता आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में बहुत प्रकार से बखानी और बताई गई है। यदि व्यक्ति, ब्रम्हचर्य का पूरी तरीके से अनुपालन नहीं कर पाता है। तो इसके दो कारण हो सकते है। पहला यह कि अभी व्यक्ति काम विकार के प्रभाव में है। दूसरा यह कि वह प्रेम की उस तल पर है जिसे हम जिस्मानी या शारीरिक कह सकते हैं। ऐसे में वह पूरी तरह अपने प्रेम का परमात्मा के आगे समर्पण नहीं कर सकता। कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार से, प्रेम की भावना व्यक्ति के मन में, काम से प्रभावित होकर उत्पन्न हो रही है। ऐसी स्थिति में परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की गुंजाइश नहीं रह जाती है। कबीर दास ने कहा था "प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई ना समाए"...

आज की मुरली 02.07.2022

आज के ज्ञान वार्ता में मुख्य बात यह थी कि माया से बचने के लिए हमेशा, घड़ी घड़ी अपने सच्चे प्रीतम को याद करो। प्रीतम आया है अपनी सारी प्रियतमा को साथ ले जाने के लिए। गुरुश्री ने समझाया है कि परमात्मा से आपका संबंध कुछ भी हो सकता है। जिस संबंध से आप उसको याद करोगे आप उसको अपने साथ वैसा ही महसूस करोगे। लेकिन ज्यादातर साधकों ने ईश्वर से अपना प्रेम का संबंध स्थापित किया है। ईश्वर परमात्मा ही, हम सभी का प्रीतम है और हम सभी बच्चे उसकी प्रेमिकायें हैं। गुरुश्री कहती हैं कि आप पुरुष और स्त्री के भेद में ना पड़े। पुरुष या स्त्री यह शरीर होता है। आत्माओं में ऐसा कोई भेद नहीं होता है। उन्होंने बताया है कि संगम युग में परमात्मा आते हैं अपने बच्चों को अपने साथ ले जाने के लिए और यह संगम युग चल रहा है। मैं इसको इस नजर से देखता हूं कि माया से बचने का इससे अच्छा और कोई तरीका नहीं हो सकता। माया अर्थात पांचों विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार यह जो व्यक्ति को अपने चंगुल में लेने लगते हैं। तो ऐसे समय में ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति उसकी अनुभूति कर ही लेता है। ऐसे घड़ी में यदि हमें परमात्मा और उसका सच्चे स्...