आज की मुरली 06.07.2022

आज के ज्ञान वार्ता में गुरु श्री बताती हैं कि अपने आत्म स्वरूप को समझ लेना और परमात्मा से उसके संबंध को जानकर उनकी याद में रहना, यह जीवन मुक्ति का वह मार्ग है, जो समझ में आ जाए तो सेकंड भर में जीवन मुक्ति के द्वार खुल जाते हैं।

बाबा कहते हैं की मांगना नहीं है। कभी भी मांगने के लिए हाथ नहीं फैलाना है। मुझे लगता है की जब हमें यह ज्ञान हो गया कि हम परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। तो मांगने का उपक्रम अपने विश्वास को खोखला करने जैसा है।

बाबा आगे बताते हैं की एक और कर्तव्य ज्ञान प्राप्ति के पश्चात निश्चित हो जाता है। वह कर्तव्य है सभी को इस कल्याणकारी प्रक्रिया से अवगत कराना। सच्ची सेवा तभी होगी जब हम इस ज्ञान की सुगंधी को चारों ओर बिखेर देंगे।

गुरु श्री कहती हैं कि हमें सिर्फ यह नहीं करना है कि मुरली सुन ली सुन के घर चले गए, उसके बाद अगला दिन बिताया फिर आए फिर सुन ली और चल दिये। मुरली के वचन, जो बातें सामने आई, उन पर मनन करना और इन बातों को और लोगों तक पहुंचाना भी हमारा दायित्व है। गुरुश्री कहती हैं कि हमें प्रयोगी बनना होगा प्रयोगी से तात्पर्य है जो योग द्वारा रचित इस ज्ञान को निरंतर अपने प्रयोग में लाता रहें।

सच बात भी यही है कि ज्ञान का वास्तविक संदर्भ में सबसे उत्तम प्रयोग यही है कि उसे बांटा जाए। जितना ज्ञान चर्चा में व्यक्ति रत होता है उतना ही ज्ञान बढ़ता है। नए नए आयाम दिखते हैं, नए नए मानक स्थापित होते हैं, नई दिशा से सोचने की युक्ति प्राप्त होती है। विधि के विद्यार्थी होने के नाते इस बात को मैं भली प्रकार से समझता हूं। यदि मैं किसी विधि को एक बार पढ़ता हूं और समझता हूं। तू उसके जो अर्थ खुल के आते हैं, उस से 10 गुना ज्यादा गहराई के तत्व व अर्थ, तब खुल कर आते हैं जब उस पढ़ी गई सामग्री पर किसी अन्य विद्यार्थी से अच्छी चर्चा हो जाए।

आज की ज्ञान वार्ता में सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि विक्रम और विकारों का त्याग ही सबसे बड़ा त्याग है। गुरुश्री कहती हैं कि हम जब त्याग के संदर्भ में सोचते हैं तो हम अपने खाने पीने की आदत या कोई अन्य रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी कोई आदत को त्याग देना बहुत बड़ी बात समझते हैं। परंतु सबसे बड़ी बात है विकर्मों और विकारों का त्याग करना।

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं। मुझे यह लगता है कि व्यक्ति जब इस तरह के त्याग की बात मन में ले आएगा। तो इसका प्रथम चरण होगा कि वह पहचान में लग जाएगा कि क्या विकर्म है और विकार क्या क्या है? मुझे यह लगता है कि पहचान हो जाना ही प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। परंतु इस चरण पर व्यक्ति तब ही पहुंचेगा, जब उसके अंदर यह भावना आ जाए कि उसे विकर्म और विकारों के त्याग के लिए आगे बढ़ना है। विकर्म और विकारों का त्याग करना शरीर को इंटॉक्सिकेट करने जैसा है। जैसे योग में, शरीर के इंटॉक्सिकेशन की चर्चा होती है। विभिन्न विधियों यथा जलनेति इत्यादि के द्वारा शरीर से इंटॉक्सिकेटेड एलिमेंट बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है। और इंटॉक्सिकेशन के बाद स्वास्थ्य में सुधार आता है। विकर्म और विकार भी ऐसे ही तत्व है जिन्हें बाहर निकाल देने के बाद ही हमारा मानसिक स्वास्थ्य ठीक हो सकेगा और हम आध्यात्मिक उन्नति के रास्ते पर आगे बढ़ पाएंगे।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
06.07.2022

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