आज की मुरली 05.07.2022

आज की मुरली में बाबा कहते है कि “मीठे बच्चे - अमृतवेले उठ बाप की याद का घृत रोज़ डालो, तो आत्मा रूपी ज्योति सदा जगी रहेगी''। गुरुश्री कहती हैं कि अमृतवेला अर्थात सुबह 4:00 बजे उठना हर रीति से लाभकारी है। यह स्वास्थ्य के लिहाज से और आध्यात्म के लिहाज से दोनों ही प्रकार से हमारे लिए लाभदायक व्यवस्था है। गुरुश्री बताती हैं कि युगों के परिवर्तन में सबसे अच्छा समय अर्थात सतयुग आने वाला है। यह उसी प्रकार से है जैसे रात के बाद दिन होने वाला है।

मुझे लगता है सुबह उठकर परमात्मा को याद करना इसलिए हर प्रकार से अच्छा हो सकता है क्योंकि उस समय पूरा वातावरण शांत होता है। ऐसे शांत समय में, जो विचार हमारे मन मस्तिष्क में रहता है वह न सिर्फ हमारी आत्मा को बल्कि हमारे पूरे वातावरण को प्रभावित करता है। परमात्मा का मनन चिंतन ऐसा विचार है जो हमें पवित्रता का बोध करा सकता है। और हमारे पूरे दिन को शुभ बनाने की शक्ति रखता है। हम यदि ध्यान दे तो पाएंगे कि अगर सुबह सुबह हमारी जुबान पर कोई गाना, गीत चढ़ जाता है तो दिन भर उसकी अनुगूंज कहीं ना कहीं कानों में सुनाई पड़ती रहती है। सुबह को हम जो भी पहला काम करते हैं वह हमारे पूरे दिन को प्रभावित करता है। तो सुबह उठकर आप अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करना और अपने सर्वशक्तिमान परमात्मा को ध्यान में लाना इससे अच्छा और कोई कार्य नहीं हो सकता। यह अपने आप को रिचार्ज करने जैसा हुआ।

जहां तक सुबह 4:00 बजे उठने का प्रश्न है। सुबह उठकर मैंने यह देखा है कि वातावरण पूरी तरह शांत होते हुए भी जागृत अवस्था में रहता है। धीरे-धीरे अरुणाई आती है और प्रकाश की किरणें हमें चारों तरफ से घेर लेते हैं। यह घटना अपने आप में एक एक्सट्रीम पॉजिटिव मोमेंट है। अंधेरा समाप्त होता है। उजाला हो जाता है। इससे अधिक अनुभव अभी तक मैं नहीं कर पाया। दिन में काम करने के घंटे हमारे पास बढ़ गए होते हैं। पहले मैं यह सोचता था की सुबह जल्दी उठने का प्रावधान इसलिए रखा गया है क्योंकि हमारे बचपन में बिजली की इतनी अच्छी व्यवस्था नहीं थी। तो अपने अध्ययन व अन्य जरूरी काम को दिन रहते ही निपटा लेना ज्यादा सुविधाजनक होता था। परंतु बिजली के आविष्कार ने और नव प्रयोगों ने रात को भी उतना चकाचौंध कर दिया है कि दिन के प्रकाश की कमी नहीं खुलती। ऐसे में भी सुबह 4:00 बजे उठना और रात में जल्दी सो जाना स्वास्थ्य और आध्यात्मिक लिहाज से अच्छा तो है। परंतु भौतिकवादी दुनिया में इसके अन्य फायदे अभी तक मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।

बाबा कहते है कि बुद्धि से बेहद का संन्यास करना है। इस छी-छी दुनिया को बुद्धि से त्याग देना है। मैं समझता हूँ कि यह सन्यास ज्ञान मार्ग का होगा। भक्ति मार्ग का नहीं। यह सन्यास तभी घटित हो पाएगा जब हम अपने को पहचानेंगे और परमात्मा के स्वरूप को अच्छे से पहचान व समझ लेंगे।

बाबा आशीर्वाद देते है कि हर सेकण्ड, हर कदम श्रीमत पर एक्यूरेट चलने वाले ईमानदार, वफादार भव। बाबा समझाते है कि हर कर्म में, श्रीमत के इशारे प्रमाण चलने वाली आत्मा को ही ऑनेस्ट अर्थात् ईमानदार और वफादार कहा जाता है।

प्रश्न उठता है की इमानदार और वफादार इन दोनों में क्या अंतर है? क्या दोनों एकदम अलग हैं? या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं? या दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? क्यों बाबा दोनों साथ होने को कहते है!!

मैं समझता हूँ, इनके शाब्दिक अर्थ ले तो ईमानदार वह व्यक्ति हुआ जो अपने ईमान पर कायम रहता है। वफादार वह व्यक्ति हुआ जो अपने वफा पर कायम रहता है।

ईमान का अरबी में अर्थ है विश्वास। इसका मतलब है किसी चीज पर विश्वास रखना। धार्मिक संदर्भों में ईमानदार होना मतलब विश्वासी होना, अपने विश्वास पर कायम रखना रहना।आमतौर पर ईमानदार का अर्थ सच्चे, विश्वसनीय, धर्मनिष्ठ व्यक्ति से लगाते हैं। मतलब यह है कि जो ईमानदार व्यक्ति होगा वह अपने ईमान पर कायम रहेगा। वह जिन विश्वास को लेकर चलता है उन विश्वासों को नहीं छोड़ेगा। उसकी पहचान समाज में इस प्रकार से होगी कि वह अपने उसूलों का, अपने विश्वासों का पक्का आदमी है। 

वहीं दूसरी ओर वफादार का मतलब होता है अपने वचन या कर्तव्य का पालन करने वाला। अपने काम को ईमानदारी से करने वाला। वफादार को स्वामीभक्त, निष्ठावान भी कहते हैं।

वफादारी कहीं ना कहीं श्रद्धा से जुड़ी हुई बात है। वफादार व्यक्ति जिसके प्रति वफा कर रहा है उसके प्रति श्रद्धावान हो, इसकी भरपूर संभावनाएं है। ऐसी श्रद्धा में, व्यक्ति अपने ईमान से इतर बातों को भी स्वीकार कर लेता है। वह अपनी वफा को कायम रखने के लिए अपने विश्वासों से समझौता भी कर लेता है। तो वफादार व्यक्ति उस व्यक्ति के प्रति तो ईमानदार होगा जिसके लिए उसके मन में वफा है। लेकिन यह आवश्यक नहीं ईमानदारी उसका एक चारित्रिक गुण हो।

ठीक यही बात ईमानदार व्यक्ति के लिए भी हो सकती है। सिर्फ वफादारी निभाने के लिये, ईमानदार व्यक्ति अपने ईमान, अपने विश्वास से समझौता नहीं कर पाएगा। इसलिए उसे वफादार नहीं कहा जाएगा।

इसलिए ईमानदार आदमी वफादार भी हो यह हमेशा संभव नहीं। उसी तरह वफ़ादार आदमी, ईमानदार भी हो यह हमेशा सम्भव नहीं। यह एक परिस्थिति में हो सकता है जब व्यक्ति का ईमान उस व्यक्ति के ईमान से एकरूपता रखता है, जिसके लिए वह वफ़ादार है।

यही कारण है कि बाबा दोनों को एक साथ रखते हैं और दोनों ही का आशीर्वाद देते हैं कि श्रीमत पर चलने वाले इमानदार वफादार भव। श्रीमत के प्रति विश्वास रखो और यह विश्वास सिर्फ ऊपर ऊपर वाला ना हो। ऐसा विश्वास हो जिसे व्यक्ति सत्य से जोड़ सकें, दिल से उसे माने, वाणी से जिसकी अभिव्यक्ति हो और जीवन में जिस का अमल हो। और ऐसे विश्वास के पक्के नुमाइंदे, पक्के वफादार बनो।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
05.07.2022

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