मैं और मेरी बात

!!ओम शांति!!

मुझे लग रहा है कि जब से मैं बाबा की मुरली सुन रहा हूं और उनको थोड़ा बहुत summarize करके, थोड़ा बहुत कट पेस्ट करके, थोड़ा अपनी समझ घुसा कर और बहुत ज्यादा गुरु श्री से समझ कर अपनी बातें लिख रहा हूं।

तब से अभी तक मैंने कभी भी इसकी शुरुआत ओम शांति के साथ नहीं की। आज पहली बार है कि ऐसा हो रहा है। आज मैं सोचता हूं कि मैं मुरली के कंटेंट पर कुछ नहीं लिखूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं सात और आठ जुलाई दोनों दिनों की मुरली मैंने सुनी और सोचा भी था कि उस पर कुछ लिखूं लेकिन जाने क्यों ऐसा हुआ कि मैं कुछ भी नहीं लिख पाया। अब हो सकता है बाबा जैसा कहते है कि इस ड्रामे का यह पार्ट भी नुंधा हुआ है।

आज मैं कुछ रेंडम लिखना चाहता हूं। इतने दिन तक मधुबन में आ जा कर, ज्ञान वार्ता में शामिल होकर, योग की प्रक्रिया करने पर, यह तो निश्चित है कि कुछ ऐसे परिवर्तन आए हैं कुछ ऐसे चेंज दिख रहे हैं, जो सच में पॉजिटिव है। पॉजिटिव शब्द अपने आप में तुलनात्मक अध्ययन का निचोड़ दिखलाता है। पॉजिटिव मतलब जीवन को जैसा होना चाहिए, जो एक मान्यता है। आदमी की जिंदगी में जो चीजें होनी चाहिए, जैसी मान्यताएं हैं। उन मान्यताओं के अनुरूप चीजें आपके साथ हो रही हैं तो पॉजिटिव में नहीं तो वह सब नेगेटिव हैं। तो यह तो तय है कि बाबा पॉजिटिव चेंजेज लाते हैं।

लेकिन सब कुछ अच्छा होने के बाद भी फिर भी लगता है कि कुछ नहीं है!! कुछ कमी है!! क्या है? और ऐसा क्यों है? इसका उत्तर खोजना ही होगा!!!!

उत्तर की खोज में, अगर मैं बाबा के बताए हुए सिद्धांतों और उनके दर्शन व अन्य सभी बातें जो अभी तक के जीवन में मैंने सीखी हैं उनसे कुछ सहारा लूं। तो मुझे लगता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएं, आसपास के लोगों से प्रभावित होते रहते हैं। बाबा कहते हैं, देह अभिमान छोड़ना है, मोह से बंधन मुक्त होना है, विकारों को दूर करना है। देह अभिमान छोड़ देना। मतलब अपने आसपास की चीजों पर जो रिएक्शन देना वह आपका वह रिएक्शन हो जो आपका होते हुए भी आपका ना हो। मतलब यह कि आप अंदर में कुछ और है इस बात को आप समझ ले कि आप एक आत्मा है। और यह एक शरीर है जो कि आपकी आत्मा से इतर है, अलग है। और इस संसार में आपके आसपास, आपके समाज में, जो घटनाएं, जो चीजें, जो संबंध आप से जुड़े हुए हैं, वह इस शरीर से जुड़े हुए हैं। तो जो भी एक्शन, रिएक्शन या इत्यादि कुछ होगा वह शरीर का अपना मैटर है। आत्मा का नहीं। तो इस तरीके से detachment की भावना से साथ आगे बढ़ना है। इसको कहते हैं विदेह हो जाना।

यह बातें अब मुझे थोड़ा सा कंफ्यूज करने लगी थी। मुझे लग रहा था कि आत्म ज्ञान और आत्म शुद्धि के लिए भी हम इस शरीर का ही साधन इस्तेमाल करते हैं। तो इस शरीर द्वारा की गई बातों का आत्मा पर असर पड़ता ही होगा। तब कैसे कोई पूरी तरह विदेह हो सकेगा।

लेकिन अब मैं इसको इस तरह समझ पा रहा हूँ कि विदेह होने का मतलब है कि अपने आप को इस तरह से तैयार कर लेना कि इस शरीर पर की गई क्रियाओं का, इस शरीर द्वारा की गई क्रियाओं का, आत्मा पर  कोई असर न पड़े।

लेकिन यह समझ एक और मुश्किल बढ़ाती है। मतलब कोई आदमी किसी की हत्या करें। और अपने आप को इस तरह से तैयार रखें कि इस हत्या का कोई प्रभाव उसकी अंतरात्मा पर ना पड़े। उसकी आत्मा तनिक भी विचलित ना हो। तो क्या यह भी विदेह होने की अवस्था है!!

.....to be continued

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