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Showing posts from December, 2022

आज़ादी का अमृत-महोत्सव: निहितार्थ

बरसों से सुषुप्त राष्ट्र की संस्थापना कराने का। दिन आया था विश्व पटल पर भारत के जग जाने का।। अगणित वीर शहीदों का, राष्ट्र भक्त मतवालों का, स्वप्न हुआ था पूर्ण, देश हित जीने मरने वालों का।। लड़ स्वराज का युद्ध, सु-राज हित अलख जगाने वालो का, दिन आया था, आज़ादी पर प्राण गँवाने वालो का।। भारतवर्ष की जागृति का, नवोन्मेष के उत्सव का। वर्ष है राष्ट्र की आजादी के, सुखद अमृत-महोत्सव का।। स्वतंत्र राष्ट्र से जुड़े हुए उन सपनों का, संघर्षों का, क्या खोया-क्या पाया, लेखा करो पचहत्तर वर्षों का।। शस्त्र-शास्त्र का अमित समन्वय, सत्य-अहिंसा-त्याग इंद्रधनुष के रंगों सा है, भारत का इतिहास।। अलग अलग टुकड़े औ रियासत, बंटा हुआ था राज्य, जागे हम, बनने को संप्रभु-लोकतांत्रिक-गणराज्य।। विश्व पटल पर सुदृढ़ रूप का, सपना देखा हमने, रियासतों का विलय कराया, देश के लौह पुरुष ने।। उद्योग-धंधे और कल-कारखाने, रखते विकास की नींव आर्थिक स्वायत्तता हेतु बो दिया औद्योगिक-क्रांति का बीज।। सीमायें सुरक्षित हो अपनी, कहीं भूख का न हो निशान, आन्दोलित राष्ट्र की आवाज़ थी, "जय जवान-जय किसान"।। खाद्य सुरक्षा अहम प्रश्न था, दे...

"खरमास"

"फिर नये साल का आगम है नये साल पर, नये प्रणों का, नयी प्रतिज्ञा ले लेने का चलता रहा चलन है। किंतु बीतता साल सदा क्यों ये कहता जाता है, प्रण कितने भी जोश में लेलो निरर्थक रह जाता है!!! साल बीतते जाते है प्रण पर प्रण चढ़ते जाते है, दुविधाग्रस्त होता है मन क्यों अधूरे रह जाते है प्रण !!! कहे कवि प्रियदर्शी प्रण तब पूरा हो पायेगा, (जब) शुभ मुहूर्त में शुभ मन से शुभ प्रण को उठाया जायेगा। प्रण पूरा न हों पाने से क्यों होते हो उदास जब प्रण उठाने को तुमने चुना था "खरमास"-जब प्रण उठाने को तुमने चुना था "खरमास"।।" ------ प्रियदर्शी प्रतीक 17.12.2022 (New Year Resolution is most common agenda at the time of dawn of new year. Similarly, Regret for unfulfilled resolution is also very common at the end of the year. In our Sanatan Culture, Period from 15th December to 15th January is usually termed as "खरमास" which is not considered as sacred or good for initiating new things. This Poem is experiment of humour by mergeing Roman Calender event with Sanatan Princi...

आज का विचार 16.12.2022

आज का विचार ~~~~~~~~ "लेखक यदि दूसरों की स्थापनाओं को ज्यो का त्यों सही न मानकर, स्वयं ही ज्ञान के मूल-स्त्रोतों पर पहुँचने की कोशिश करें तो सत्य उन्हें अधिक स्पष्ट होकर दिखाई पड़ेगा और वे ऐसी बहुत सी गलत बातों को दुहराने से बच जाएंगे जो सिर्फ गलत हैं।" ----- "संस्कृति के चार अध्याय" रामधारी सिंह दिनकर यह विचार आज के सोशल मीडिया के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाता है। इससे विधि के क्षेत्र में कार्यरत लोग हमेशा दो-चार होते रहते है। बहुधा ऐसे अनुभव होते है कि जिस  प्रक्रिया अथवा नियम का पालन परंपरागत होता आ रहा है, वह मूल स्रोत से तुलनात्मक रूप से एकरूपता नहीं रखता। इस संदर्भ में, विधिक बिंदु पर समाचार चैनलों पर किया जा रहा विश्लेषण, विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। जैसे:- न्यायालय की सामान्य प्रक्रिया का हौवा बनाकर पेश करना, साक्ष्य का विश्लेषण (जो विधि के जानकार व्यक्ति के लिये भी कठिन कार्य है) उसका आंकलन करने निर्णयन करना इत्यादि। मूल स्त्रोतों से अगर उन बातों का मिलान करने का कष्ट उठा लिया जाए तो विमर्श बदला हुआ होगा। ------ प्रियदर्शी प्रतीक 16.12.2022