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Showing posts from June, 2018

धर्म का लोप, सामाजिक मूल्यों का क्षरण: धर्मनिरपेक्षता का दंश

औपनिवेशिक शासन के समाप्त होने के बाद जिस संकल्पना ने हमारे सामाजिक व राजनीतिक जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वह है धर्मनिरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान...

बैंकिंग में हिंदी: अनिवार्यता या आवश्यकता

भाषा न सिर्फ सम्प्रेषण का माध्यम है अपितु विचारों की संवाहक और संग्राहक भी है। व्यक्ति को व्यक्ति से, समाज को समाज से न सिर्फ जोड़ने बल्कि तोड़ने में भी भाषा की भूमिका रही है। भाषा की शक्ति की सीमाओं को समझने के लिये, राम मनोहर लोहिया की यह बात प्रासंगिक है कि सदियों से मनुष्य ने अपनी सम्प्रभुता को स्थापित करने के लिये, स्वयं को अन्य से अलग दिखाने के लिये जिन कारको का प्रयोग किया है वे हैं:- भाषा, भवन और भूषा। जिनमे भाषा सर्वाधिक शक्तिशाली रही है फिर वो चाहे पाली, प्राकृत, संस्कृत, फारसी या अंग्रेजी रही हो। औपनिवेशिक काल से ही हमारे यहां जो धारा बह रही है उसमें अंग्रेजी हमारे काम काज, राज काज और ज्ञानार्जन की भाषा बन गयी है। संविधान निर्माताओं ने स्व भाषा का महत्व समझा और हमारे संविधान में हिंदी को राज भाषा का दर्जा देकर उसके प्रचार प्रसार और व्यवहार हेतु आबश्यक उपबंध किये। इन उपबंधों के अंतर्गत ही वो नियम भी बने जिनके फलस्वरूप बैंको में हिंदी के प्रयोग और प्रसार हेतु कार्य हुए। आज के विषय "बैंकिंग में हिंदी: अनिवार्यता या आवश्यकता" में अनिवार्यता इन्हीं प्रावधानों को...