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ओशो: बुद्ध की देशना "अतृप्ति क्यों?"

भगवान बुद्ध की सुललित वाणी "धम्म पद" पर प्रश्न-उत्तर को अपने में समेटे हुए 12 पुस्तकों की निधि में से यह आठवी पुस्तक अतृप्ति क्यों?, उन सभी प्रश्नों के उत्तर देती जिन्हें किसी भी व्यक्ति का मन जीवन के किसी काल खंड मे अवश्य खोजता है। बुद्ध की देशना को आधुनिक समाज की जिज्ञासा के संदर्भ में निर्वचित करते हुए ओशो व्यक्ति के मनोविज्ञान की तहें उलट कर सत्य को सुरभित करते है। ओशो की वाणी को "संभोग से समाधि तक" ही समझने वालों और उनके कथन को "बुद्धि विलास" या "वैचारिक खुजलाहट" कहने वालो को ये अवश्य पढ़नी चाहिए। किसी उपन्यास के भाँति ही यह पुस्तक आपको समाप्ति के समय, अपनी अंतिम घड़ी में दो शाल वृक्षों के मध्य में लेटे भगवान् बुद्ध के सामीप्य का बोध कराती हैं। बुद्ध के सूत्रों को परत दर परत गीतों, कथाओं और मनोविज्ञान के संयोजन से खोलते हुए ओशो आपको कब अपने से जोड़ लेते है, राग उत्पन्न कर देते कि आप समझ ही नहीं पाते। पुस्तक की समाप्ति मन में दुःख उत्पन्न करती है। याद दिलाती है इस पुस्तक के प्रथम सूत्र की "नत्थि रागसमो अग्नि" अर्थात "राग के समा...