Posts

Showing posts from 2025

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती खौफ के साये में मिचमिचाती आँखें  शोर और दर्द से पथराती आँखें  जुल्म की इंतेहा को देखकर के डर के खुलती-बंद हुई जाती आँखें देख, बर्बरता की खुशियां मनाती जाती भीड़ चीखती और चिल्लाती जाती सैकड़ों चेहरों से बनती भीड़ देखी  एक चेहरा भीड़ का अब सामने था देखने सुनने में था इंसान जैसा किंतु उसकी पाशविकता क्रूरता निर्दयी शैतान सा चेहरा बनाती  भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती कौन से आदर्श वो सिखला रहे है किस तरह के मूल्य गढ़ते जा रहे है पाशविकता क्रूरता से लबरेज जनता नृशंसता के उत्सव में डूब करके शुभ्र मानवता की खिल्ली है उड़ाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती अधर्म करती धर्म की वो आड़ लेकर मध्य युग की मूढ़ता को श्रेय देकर मौत देकर मौत का उत्सव मनाती फिर पाप को पुण्य से बेहतर दिखाकर पैरों तले इंसानियत कुचलती जाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती मज़हबी तकरीर से बेबाक होकर तालिबानी शरीयतों से लैस होकर कुफ़-कुफ़्र कुफ़्र-कुफ़्र कुफ़्र कहके  इंसानियत को मजबूर औ लाचार करके कत्ल कर हैवानियत के रंग दिखाती भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती वो भीड़ किस ...

नुक्कड़ नाटक: The Classroom – “Competition Se Pehle Compassion!”

दृश्य 1 :  The Classroom – “Competition Se Pehle Compassion!” (क्लास रूम का दृश्य। बच्चों के रिपोर्ट कार्ड आ चुके है। बच्चे साथ खड़े है और उनके टीचर्स भी साथ खड़े है। ) एक टीचर: तुम बच्चे हो इस स्कूल की जान, अच्छे नंबर लाकर दी है तुमने इस स्कूल को पहचान सब बच्चों congratulate करते है। टीचर: अरे अर्जुन, तू क्यों लगता उदास है, मार्कशीट नही तेरे पास है। (फिर रिजल्ट चेक करके कहते है): इस साल के इस रिजल्ट में टीना है टॉप और अर्जुन हुआ है फ्लॉप सब बच्चे खिलखिलाते है। लोग तालियां बजा रहे मोना: (हंसते हुए) इसकी मार्कशीट में नहीं है दम, हर सब्जेक्ट में है इसके नंबर कम टीचर: शरारत में लगता ध्यान है, स्कूल तुझसे परेशान है। नाक में कर देता है दम, और नंबर भी लाया है इतने कम (सचिन सर झुकाके खड़ा है) (सभी हंस रहे है) टीना: sorry सर क्या मैं कुछ बोल सकती हूं। टीचर: बिल्कुल बच्चा, तेरी बातों के तो सब है कायल, तू ही तो है इस क्लास की गूगल।  टीना: जब हम सभी बच्चे है स्कूल की जान, हम सभी से है इसकी पहचान, तो क्या ठीक होगा हममें प्रतिस्पर्धा का भाव, और सामंजस्य-सद्भाव का अभाव टीचर: वाह टीना, तुम्ह...

नज़्म मोहब्बत और रुसवाई

मोहब्बत की सड़क पर तुम भी मै भी  हर खुशी औ रंज-ओ-गम के हमसफर भी फिर क्यों भला हर मोड़ पर कतरा रहे हो उलझनों से इस कदर घबरा रहे हो हैं मोहब्बत तब तो उलझन भी रहेगी दिल में धड़कन, साथ तड़पन भी रहेगी सच्चे आशिक़ को क़ज़ा का खौफ कैसा प्रेमी का हो साथ जब तौफीक जैसा गर दुनियावी रस्मों रिवाजों के पार जाओगे (तो ही) माशूक की बाहों में नजात पाओगे जब खौफ के साये में बसर करना है फिर क्यू भला मोहब्बत का सफर करना है जब तेरा अरमान ही, मेरे प्यार को रुसवा करना किस हौसले किस दम फिर प्यार का दम भरना घुट घुट कर जब तिल तिल के ही हमें जीना है मेरे महबूब मुझे जीना नहीं मोहब्बत के लिए मरना है।। मेरे महबूब मुझे जीना नहीं मोहब्बत के लिए मरना है।। ---- ---- प्रियदर्शी प्रतीक 21.11.2025 डुमरांव, बक्सर  (मित्र कवि नीरज के दर्द से प्रेरित)

नुक्कड़ नाटक--ट्रैफिक जाम: छोटी दूरी, बड़ी सोच

ट्रैफिक जाम: बच्चे गाड़ियों की शक्ल बनाकर खड़े हैं। सब एक दूसरे से  लड़ते भिड़ते आगे पीछे हो रहे हैं। आगे का रास्ता नहीं दिख रहा है। गाड़ियां जोर से हॉर्न बजा रही है। चारों तरफ शोर ही शोर है। गाड़ियों से निकलता धुआं माहौल को और जहरीला बना रहा है। बच्चे एक साथ: सुनो सुनो और जागो सब, पास आओ मत भागो सब, बातों में है दम - वंदे मातरम, जीने का ढंग - सिखलाते है हम  वंदे मातरम - वंदे मातरम नाटक का दृश्य:----- एक बच्चा गब्बर सिंह के रूप में: कितनी गाड़ियां है स्टूडेंट बच्चा: सरदार, सैकड़ों गब्बर: और बच्चे कितने है?? स्टूडेंट: सरदार, पचास गब्बर: पचास बच्चों ने स्कूल आने के लिए इतना शोर मचा रखा है कितनी दूर है स्कूल? स्टूडेंट: सरदार, 3 किलो मीटर गब्बर: तीन किलोमीटर जानें के लिए तीन सौ गाड़ियों का जाम, इतना शोर और इतनी परेशानी बहुत नाइंसाफी है!!!!!!! क्या मिलता है, गाड़ी से स्कूल आकर स्टूडेंट: रोते हुए...रोज पापा की डांट, स्कूल लेट होने का डर, और ढेर सारी टेंशन गब्बर: गुस्से में....इतना शोर और इतना पॉल्यूशन क्या तुम्हारे दोस्त गिनाएंगे स्टूडेंट: जोर से रोते हुए....वो भी मिलता है लेकिन उसक...

नुक्कड़ नाटक: प्लास्टिक से दूरी -ना रहे मजबूरी

दृश्य 1 : The Plastic Habit – “Ek Baar Ka Nasha!” (बाज़ार का दृश्य। बच्चे प्लास्टिक बोतलें खरीदते जा रहे हैं। खाली बोतलें फेंकी जा रही हैं।) Narrator: सृष्टि का नियम है जो जन्म लेता है उसे मरना भी होता है। सब इसी जल, वायु, आकाश, अग्नि व भूमि से बनते हैं और मरकर इसी में विलीन हो जाते हैं। एक बच्चा (उत्साहित लेकिन अनजान): सब का मतलब क्या हुआ आदमी जानवर पेड़ पौधे और सामान भी!!!! Narrator: हा सब कुछ। यह प्रकृति का नियम है। एक बच्चा हंसते हुए, हाथ में प्लास्टिक पानी की बोतल लिए— इसका मतलब इंसान ने प्रकृति पर जीत हासिल कर ली। इंसान ने ऐसा कुछ बना दिया जो जन्म-जन्मांतर तक नहीं समाप्त होता। वैसे का वैसा बना रहता है। यह प्लास्टिक...हंसता है hahaha  सभी बच्चे आश्चर्य में है। Narrator: हंसता है hahahah  बच्चे तूने दूसरा नियम तो सुना ही नहीं। जो नहीं मरता, वैसा का वैसा बना रहता है वही इस प्रकृति का, इस सभ्यता का, इस समाज के विनाश का कारण बनता है। फिर हंसता है hahaha ये देखो--- (बच्चे एक एक करके हाथों में पोस्टर लेकर गुजरते है जिसमें प्लास्टिक के कारण हुई त्रासदी की फोटो है। और एक एक करके ...

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Image
Depicting the Enlightenment of Budhha in a statue must be a sense of accomplishment for the sculptor. Compassion n Blissfulness n Calmness..... Budhha has inter-alia taught "रसो वै स:"( रस वहीं है जहां सत्य है), "सो करोही दीपमत्तनो" (द्वीप बनो अर्थात सब संबंधों से मुक्त हो जाओ और असंग हो जाओ), "छंदजातो अनक्खातो" (जिसे कहा नहीं जा सकता). This statue of Budhha is settled in #Sanchi showcasing these virtuous teaching of Budhha. This is the Only Statue of Budhha with a face at Sanchi Stupa. Everlasting calmness on the face and posture, even after facing a brutal ordeal. I am unable to ascertain the level of idiotic, barbaric and inhumane mind set of people who assaulted the statue and of the thought process which paved the way for such assault. I feel that nowadays, primarily Budhha used to come in the life of the average Indian in some political sense. Or at least mine case was so. After going through the words of #Osho in his series of Books on B...

ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ

ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ ज़िंदगी एक सफर है सुहाना हमने सीखा इसे गुनगुनाना गुनगुनाते हुए जीने में आता है मजा मज़े मज़े में होश खो मदहोश होता हूँ ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।। जिंदगी में मची हुई है आपाधापी लाइन लगाने की- कभी लाइन से आगे जाने की बेताबी ज़िंदगी के परमाणु में सब इलेक्ट्रॉन बन घूमते है मै उसके केंद्र (nucleus) में न्यूट्रॉन सम सोता हूँ ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।। ज़िंदगी क्या सिर्फ है एक दौड़ आदमी की जिंदगी है या टाइम लाइन की होड़ पढ़ता हूँ समय सापेक्षता पर आइंस्टींन का शोध कछुये- खरगोश की दौड़ में, खरगोश होता हूँ ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।। ज़िंदगी के है अपने फलसफ़े कुछ खुल के, कुछ बंधनों में है जिये वो समझते है बंधन को ही अनुशासन मौज के अनुशासन में जिंदगी जीता हूँ ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।। ---- प्रियदर्शी प्रतीक डुमराँव, बक्सर 05.08.2025

नायिका

नदिया के कूल पर धारा संग खेलत है, निरखत है जल तरंग, मोहत है- रिझत है; धार बीच धारा में पायल संग पद परसे,  पायलिया झनकार, कल कल है- झल झल हैं। बादल की राशि बीच सौदामिनि सी गरजे विपुल जल राशि में पद पटकत झटकत है नीर भर अंजुरी आकाश में उछालत वो प्रकृति की सुषमा सम निखरत है बिखरत है। स्वर्णिम सी नायिका, चंदन सम शीतलता; कलाधर की कला सम चलत है- बैठत है; वारी वारी जात है, भुवन मन मोहिनी पर "प्रतीक" रूप राशि विलोचन में समेटत है। ------ प्रियदर्शी प्रतीक 12.06.2025

जीवन यह हर क्षण अनुपम है

जीवन यह हर क्षण अनुपम है निमिष निमिष पुरनव है, नूतन है निमिष मात्र में, हृदय द्वार पर दस्तक है; निमिष मात्र में मन में बसा चिरंतन है; जीवन यह हर क्षण अनुपम है। ग्रीष्म ऋतु के जेठ माह मे विकल हुआ जग; प्रेम ऋतु में सद्य नहाया अविकल मन; निमिष मात्र में परिवर्तित संसार सकल है,  श्लेष मात्र भी नहीं बदलता मन- कानन है जीवन यह हर क्षण अनुपम है । जाने क्या संचारित होता मन:स्थल में,  उमड़ घुमड़ कर बरस रहा ज्यों बादल है,  मन मतंग हो विचर रहा सुर कानन में, कस्तूरी की गंध से सुरभित तन-मन है। जीवन यह हर क्षण अनुपम है। शस्य- श्यामला सी प्रेयसी की आभा को,  निरख निरख हर्षित होता मन मधुकर है, उन्मादित हो सुलग उठी रोमावली ऐसे,  जैसे घृत आहुति पर भभकी हवन अगन है। जीवन यह हर क्षण अनुपम है। आत्म पुंज से निकल पड़ी हर आत्मा की, यात्रा का वृतांत सघन है - दुर्गम है,  निमिष निमिष से कल्प कल्प की यात्रा में,  उनसे मिलना सुहृद आत्म संयोजन है। जीवन यह हर क्षण अनुपम है। ------ प्रियदर्शी प्रतीक 11.06.2025

ओशो: बुद्ध की देशना "अतृप्ति क्यों?"

भगवान बुद्ध की सुललित वाणी "धम्म पद" पर प्रश्न-उत्तर को अपने में समेटे हुए 12 पुस्तकों की निधि में से यह आठवी पुस्तक अतृप्ति क्यों?, उन सभी प्रश्नों के उत्तर देती जिन्हें किसी भी व्यक्ति का मन जीवन के किसी काल खंड मे अवश्य खोजता है। बुद्ध की देशना को आधुनिक समाज की जिज्ञासा के संदर्भ में निर्वचित करते हुए ओशो व्यक्ति के मनोविज्ञान की तहें उलट कर सत्य को सुरभित करते है। ओशो की वाणी को "संभोग से समाधि तक" ही समझने वालों और उनके कथन को "बुद्धि विलास" या "वैचारिक खुजलाहट" कहने वालो को ये अवश्य पढ़नी चाहिए। किसी उपन्यास के भाँति ही यह पुस्तक आपको समाप्ति के समय, अपनी अंतिम घड़ी में दो शाल वृक्षों के मध्य में लेटे भगवान् बुद्ध के सामीप्य का बोध कराती हैं। बुद्ध के सूत्रों को परत दर परत गीतों, कथाओं और मनोविज्ञान के संयोजन से खोलते हुए ओशो आपको कब अपने से जोड़ लेते है, राग उत्पन्न कर देते कि आप समझ ही नहीं पाते। पुस्तक की समाप्ति मन में दुःख उत्पन्न करती है। याद दिलाती है इस पुस्तक के प्रथम सूत्र की "नत्थि रागसमो अग्नि" अर्थात "राग के समा...

IIT बाबा: शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूं

बीते दिनों से एक गीत काफी लोकप्रिय हुआ है जिसके बोल है "शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूं।" इसे जैसे गाया गया, मुझे उसका भाव आता है वह बहुत ही अच्छा था और बहुत लोगों को पसंद आया ।  इस गीत को मैंने भी कई बार गुनगुनाया और कई बार अपने फोटो के साथ इसका बैकग्राउंड म्यूजिक लगाया भी। लेकिन मैं समझ नहीं सका था। इसके मायने क्या है शून्य हो रहा हूं मतलब क्या हो रहा है क्यों शून्य हो रहा हूं??? हमें बचपन से जब स्कूल कॉलेज में पढ़ते हैं तो पढ़ाई के दौरान टीचर कहते हैं जो बच्चा ठीक से पढ़ाई नहीं करता कि तुम्हारे शून्य आएंगे, तुम जीरो हो। और जीरो को, शून्य को बड़े ही बेअदबी के साथ देखा जाता है, अपमानजनक अवस्था को दिखाता था जीरो या शून्य । फिर इसको क्यों लोग इतना पसंद कर रहे हैं क्यों यह कहते हैं कि मैं शून्य हो रहा हूँ, शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूँ। ओशो की बुद्ध की देशना पर एक सीरीज किताबों की है जिसमें से आठवां भाग है अतृप्ति क्यों? इसमें एक जगह शून्य की बात करते हुए, निर्वाण और मोक्ष के अंतर को समझाते हुए ओशो कहते हैं कि "शून्य एक संख्यातीत चीज है।, शून्य मा...

माघ पूर्णिमा महाकुंभ स्नान डायरी

#माघ #पूर्णिमा, #महाकुम्भ, #प्रयागराज ----------------------------------------- माघ का सूर्य अस्त होने को था, अरैल के घाट से मद्धम गति से यमुना जी के जल में गोते लगाते हुए नाव पवित्र संगम की ओर बढ़ रही थी। अपने चारों और मैं देख पता था कि एक दूसरे से बिल्कुल अनजान व्यक्तियों का समूह अपने-अपने समूह में रहते हुए, एक बड़े समूह का निर्माण कर रहा था जिसमें सबके अंदर,बहुत हद तक, एक समान भाव, धार्मिक चैतन्यता और उत्साह था। पानी पर तैरते हुए कृत्रिम घाट के पास सैकड़ो नाव लगी हुई थी जिनमें कुछ नाव से निकल कर घाट पर पहुंच के स्नान की तैयारी में लगे थे तो कुछ लोग वापस आ जा रहे थे नदी के बीच नावों का आपस में टकराना और एक दूसरे के बीच रास्ता बना देना, इन सभी प्रक्रियाओं के बीच में हर व्यक्ति का मन धार्मिक आस्था से लबरेज हो पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए तैयार हो रहा था। घाट से नीचे पैर रखते ही मखमली बालू की तलहटी का स्पर्श होता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था है या कृत्रिम तौर पर प्रशासन द्वारा किए गए प्रबंध कि इस विराट संगम स्थली पर घुटने भर जल का प्रवाह देखने को मिलता है, जिसमें निर्भय हो सशरीर प्रवेश...