जीवन यह हर क्षण अनुपम है

जीवन यह हर क्षण अनुपम है
निमिष निमिष पुरनव है, नूतन है
निमिष मात्र में, हृदय द्वार पर दस्तक है;
निमिष मात्र में मन में बसा चिरंतन है;
जीवन यह हर क्षण अनुपम है।

ग्रीष्म ऋतु के जेठ माह मे विकल हुआ जग;
प्रेम ऋतु में सद्य नहाया अविकल मन;
निमिष मात्र में परिवर्तित संसार सकल है, 
श्लेष मात्र भी नहीं बदलता मन- कानन है
जीवन यह हर क्षण अनुपम है ।

जाने क्या संचारित होता मन:स्थल में, 
उमड़ घुमड़ कर बरस रहा ज्यों बादल है, 
मन मतंग हो विचर रहा सुर कानन में,
कस्तूरी की गंध से सुरभित तन-मन है।
जीवन यह हर क्षण अनुपम है।

शस्य- श्यामला सी प्रेयसी की आभा को, 
निरख निरख हर्षित होता मन मधुकर है,
उन्मादित हो सुलग उठी रोमावली ऐसे, 
जैसे घृत आहुति पर भभकी हवन अगन है।
जीवन यह हर क्षण अनुपम है।

आत्म पुंज से निकल पड़ी हर आत्मा की,
यात्रा का वृतांत सघन है - दुर्गम है, 
निमिष निमिष से कल्प कल्प की यात्रा में, 
उनसे मिलना सुहृद आत्म संयोजन है।
जीवन यह हर क्षण अनुपम है।


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प्रियदर्शी प्रतीक
11.06.2025

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