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Showing posts from June, 2022

करुणा और दया में अंतर

यदि हम शब्दकोश मैं इन दोनों शब्दों का अर्थ ढूंढ लेंगे तो कमोबेश दोनों समानार्थी दिखाई पड़ेंगे। परंतु दोनों ही शब्द जिन भावनाओं को निरूपित करते हैं उनके आधार और प्रभाव में सूक्ष्म अंतर है। 1. दोनों ही शब्द मनुष्य की मनोस्थिति को दिखलाते हैं। परंतु करुणा सदैव बनी रहने वाली या स्वभावगत मनोस्थिति है। दया की भावना उत्पन्न होती है किन्हीं परिस्थितियों में। उदाहरण के तौर पर:-  एक करुणामय व्यक्ति किसी भी तरह की जीव हत्या नहीं रह पाएगा। वह मांसाहारी नहीं हो सकता। परंतु ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि एक मांसाहारी व्यक्ति को कभी-कभी उस जीव पर दया आ जाए जिसको मारने के बाद उसका भोजन तैयार होने वाला है। जैसे हमने कहीं कहीं देखा होगा चित्रों में कि शेर हिरण के बच्चे पर हमला नहीं कर रहा। यद्यपि वह करुणामय मन स्थिति का नहीं है। 2. एक विचारक कहते हैं दया कहीं ना कहीं अपने भीतर अहंकार को समाये रखती है। दया शब्द ही यह दर्शाता है कि उसमें दो पक्ष हैं। एक पक्ष सबल है, सामर्थ्य वान हैं और दूसरा दयनीय है। मजबूत व्यक्ति अपने से कमजोर पर दया दिखाता है। धनी व्यक्ति गरीब पर दया करके उसके सहायता कर देता है। परंतु...

आज की मुरली 29.06.2022

आज की मुरली गुरुश्री ने सुनाई। आज की मुरली में मुख्य बात यह है कि बाबा कहते हैं तुम्हें परमात्मा का परिचय सब को देना है लेकिन किसी से बहुत बहस नहीं करनी है। यह बात बिल्कुल सही लगती है क्योंकि यह विषय ऐसा नहीं है, जिसमें कुछ इस प्रकार से सिद्ध किया जा सके कि अगले व्यक्ति के पास आपकी बात ना मानने की कोई गुंजाइश ही ना बचे। आध्यात्मिकता का क्षेत्र साइकॉलजी के विषय की तरह है। इसकी कोई निश्चित परिभाषा या सीमा नहीं है। हर दिन नया है, हर वक्त नई पहेली है। इसीलिए यह बात एकदम सही है कि इस विषय पर किसी से बहुत ज्यादा बहस नहीं करनी चाहिए। अब बहस करके यह बात किसी को नहीं मनवा सकते हैं। जिसको समझ में आ जाएगा, जो महसूस कर लेगा वह मान भी जाएगा। तो कर्तव्य सिर्फ इतना सा है की परिचय दे देना है। रास्ता दिखा देना है। चलना ना चलना उसके हाथ। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो बाबा कहते हैं। वह यह है कि जब आप ज्ञान के मार्ग पर चलते हैं तो माया कई प्रकार से आप को घेरने का प्रयास करती है। उससे बचने का तरीका यह है कि अपने आप को याद और सेवा में लगा देना। गुरु श्री ने बताया है की याद का अर्थ परमात्मा को सदैव अपने ध्यान में ...

नैराश्य में प्रकाश

मन व्यथित है, चेतना के द्वार पर लटके है ताले; उत्तरों की खोज में बहता ये मन कैसे संभाले। सत्य के अभ्यास में बस वेदना सहनी पड़ी; जग थमाता है सदा सुकरात को जहरों के प्याले। जब किसी मंतव्य को उसकी कसौटी पर कसो; तब नजर आयेंगे काले मेघ में डूबे उजाले। जो समझ के पार हो, वो बात उन पर छोड़ दो; वो ही करें अब फैसला, तुमको डूबा दे या उबारे।। ----- प्रियदर्शी प्रतीक दलसिंहसराय, समस्तीपुरम 28.06.2022

मुरली 27.06.2022

आज ज्ञान वार्ता में अविश्वास के बादल छाए हुए थे। अविश्वास के स्वर है जिन्हें मैंने अपने ब्लॉग में चिन्हित किया था। उन्हीं स्वरों का नाद ज्ञान वार्ता में छाया रहा। गुरु श्री इस बात को लेकर असहज थी कि कोई इतना अविश्वास लेकर किस प्रकार से विश्वास प्रदर्शित कर सकता है। मैंने अपना पक्ष रखने की कोशिश की, कि "मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।" लेकिन विश्वास का तंतु बड़ा लचीला होता है। एक बार हिल जाने पर उसमें बहुत समय तक तरंगे उठती रहती है। मुझे लगता है कि गुरुश्री का विश्वास मेरे ऊपर से उठ गया है। मैं समझता हूँ कि उन्हें यह लग रहा है कि अविश्वास की चादर ओढ़े हुए व्यक्ति कैसे विश्वास की प्रशांति महसूस कर सकता है। मुझे लगता है कि मैंने जिन चीजों को जाना है मधुबन में जाकर और जिन पर मेरा विश्वास हुआ है। वह मेरे लिए बहुत है। उतना ही मानने के बाद भी मेरा काम में इस विश्वविद्यालय में चल सकता है। मुझे नहीं लगता कि सारी की सारी बातें मान लेनी जरूरी है। वो भी तब जब मन उनकी सत्यता को महसूस नहीं कर पा रहा है। और जिसे मैं सत्य महसूस कर रहा हूं उसे अपनाने का भी प्रयास कर रहा हूं। मानना और अपनाना दो अ...

अविश्वास के स्वर: प्रजापिता ब्रह्मा ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संदर्भ में

सत्य की खोज में जब आप रहते हैं तो ऐसे ऐसे प्रश्न मन में खड़े होते हैं जिनके उत्तर सहज उपलब्ध नहीं होते हैं। ऐसे में आपके आसपास का वातावरण आपको अविश्वासी या अनिश्चयात्मक बुद्धि का समझ सकता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। न जाने क्यों आज सुबह मन में ऐसी इच्छा जागी कि देखा जाए कि जिस बात पर, जिस संस्था पर, जिस विचार पर, मैं घोर विश्वास करके कदम आगे बढ़ा रहा हूँ। कहीं उसमें कोई त्रुटि और दोष तो नहीं है। इसमें मैंने गूगल पर "ब्रह्माकुमारी controversies" को सर्च किया। इस तर्ज पर मुझे जो चीजें देखने को, पढ़ने को मिली। उनको मैं मुख्य रूप में, इन बिंदुओं में देखता हूँ। पहला बिंदु, युगों की कल्पना जो ब्रह्माकुमारी दर्शन में की जाती है उस पर वैज्ञानिक शोधों, भू वैज्ञानिक तथ्यों व अवधारणाओं के आधार पर अविश्वास। दूसरा बिंदु, बाबा की आत्मा का गुलजार दीदी में आना, बाद में गुलजार दीदी की आत्मा का मोहिनी दीदी में आना इत्यादि बातों पर शंका। तीसरा बिंदु, इस दर्शन के फॉलो करने पर लौकिक संसार से धीरे-धीरे आने वाली परित्यक्तता, अरुचि। अब इसको आप मेरा अंधविश्वास है या जो कुछ भी कह सकते हैं प...

आज की मुरली 26.06.2022

आज की ज्ञान वार्ता में मूल बिंदु था " तपस्या का प्रत्यक्ष फल- खुशी"। गुरु श्री ने समझाया कि तपस्या तब से प्रारंभ हो जाती है जब हम यह समझ जाते हैं कि हमारा स्वरूप क्या है और हमारा परमात्मा से क्या संबंध है। एक बार उस स्वरूप को समझ लेने के बाद, उस स्वरूप में रहने के लिए हमें जो यत्न करने पड़ते हैं वही तपस्या है। ब्रह्मा बाबा कहते हैं कि हमारा यह भाग्य है कि हमे यह जानने का अवसर मिला है। इस भाग्य के साथ स्वराज्य मिला है। भविष्य विश्व का राज्य स्वराज्य का जी आधार है। गुरुश्री समझाती हैं कि स्वराज्य मिलने का अर्थ अपने मन पर, इंद्रियों पर, राज्य मिलने से लगाना है। यह स्वराज ही विश्व पर राज्य करने का प्रथम चरण है। आगे गुरुश्री कहती है कि ज्ञान प्राप्ति का मुख्य आयाम यह समझना है कि हम परमात्मा के बच्चे है। उसे पिता समझकर उसी अनुरुप बात व्यवहार को समझना है जैसे की पिता -पुत्र के संबंध में हम समझते आये है। यह मानसिकता छोड़नी है कि हम परमात्मा के गुलाम हैं। और उसी अनुरूप परमात्मा से अपने संबंध को समझना, सुधारना है। यह बात पिछली मुरली की इस बात से संपुष्ट होती है कि कर्म मनुष्य के हाथ मे...

आज की मुरली दिनांक 25.06.2022

आज की ज्ञान चर्चा में, ब्रह्मा बाबा कहते हैं कि सच्चे बाप को सब हिसाब किताब सही सही बताते रहो और श्रीमत लेते रहो। इसी में तुम्हारा कल्याण है। गुरुश्री समझाती हैं कि सच्चे बाप अर्थात परमात्मा को सब हिसाब सही-सही देने का मतलब यह है कि मन के अंधेरे में कोई बात छुपा कर नहीं रखनी है। किसी भी तरह का विकार अगर आ जाता है तो उसको सीधे परमपिता को बता देना है। वह समझाती हैं कि श्रीमत लेने का मतलब है, जब कभी किसी बात पर उलझन महसूस हो, ज्ञान मार्ग पर चलते हुए मन में भटकाव हो, किसी परिस्थिति में क्या उचित निर्णय रहेगा बुद्धि वह निर्णय नहीं कर पा रही हो; तो ऐसे में सीधे-सीधे सारी बात परमात्मा को बता कर उनसे श्रीमत लेनी चाहिए। गुरुश्री कहती हैं कि यह श्रीमत बाबा की मुरली में भी अनायास ही मिल जाती है। मैंने भी यह महसूस किया की कभी कोई समस्या या विचार मन में उलझन उत्पन्न किया तो आने वाले दिनों की मुरली में उसके जवाब या उचित हिंट मिल ही गए।  गुरुश्री आगे कहती हैं कि निश्चयात्मक बुद्धि का होना और तन मन धन से ईश्वर को समर्पित होना, परमात्मा की प्राप्ति की दिशा में प्रथम चरण है। गुरु श्री समझाती हैं कि ...

मुरली दिनांक 24.06.2022

कल दिनांक 24.06.2022 की मुरली महावाक्य "कर्म ही सुख और दुख का कारण है" पर आधारित थी। इस बात को आधार रूप में रखा गया कि जीवन में दुख और सुख कर्म के आधार से प्रारब्ध रूप में चलते हैं। यह पहले के ही किए गए कर्म है जिनकी प्रारब्ध दुख हो या सुख के रूप में भोगनी होती है। तो ऐसे में सुख और दुख का संबंध कर्म से हो गया। इस बात को साफ किया गया कि कर्म कोई किस्मत नहीं है। परंतु मुझे लगता है कि कर्म जो पिछले जन्म में किए गए जिनका प्रारब्ध हमें भोगना है उसे किस्मत ही कहना चाहिए। वही किस्मत है। परंतु गूढ़ अर्थों में देखें तो वह किस्मत हमारे ही कर्म पर आधारित है इसलिए सूक्ष्म रूप में मातेश्वरी की बात सही है। इस बात को साफ किया गया की जीवात्मा ही अपना शत्रु और अपना मित्र होता है। वही अपने सुख और दुख का कारण है। परमात्मा को सुख और दुख दोनों का कारक नहीं कहा जा सकता। इस बात को समझाने के लिए मातेश्वरी हमें समझाती हैं कि देखो जब हम कभी भी दुख में होते हैं तो हमें सबसे ज्यादा, सबसे पहले भगवान याद आते हैं। हम परमात्मा की याद करते हैं। तो क्या ऐसा हो सकता है कि हम उसको याद करें जिसके कारण हमें दुख ह...

Day 23.06.2022 at BrahmaKumari's Center Samastipur

If I have to describe my day on 23rd of June 2022 then it could not be described otherwise than BrahmaKumari's Day. Due to great effort of my revered GuruShree, I got an opportunity to see the Eastern Zone Head of BramhaKumari's Rani didi at Samastipur. What a mesmerizing persona she carries. While going to meet, I was thinking what short of questions I should ask to her; how should I interact!! But lastly my mind suggested me to make it an open ended, God determined interaction and discussion. It was just a first meet but it appears to me and to others too that we were knowing to each other since long. The personality she carries is having some short of hypnotism. Whatever she said said it was full of conviction in her faith & beliefs. Her connect with Shiv Baba was apparent and clear. Before her, I interacted with my GuruShree Sonika Di and Savita Di. I need to reiterate that my connect with Shiv Baba n Prajapita BrahmaKumari family is only due to pious but powerful, magn...

Question Hour

Question:-- Should we keep on suffering toxic relationship ad infinitum as long as 12 years? What is more important life or social reputation? Should we waste our time and youth for someone who never understand even in 12 years? Answer:- Removing toxicity is only solution. It could be achieved only by Acceptance n Forgiveness. Never think about adjustment, Just work on Acceptance n Forgiveness. *Lastly Be in Relationship without indulging into Relationship. * Operation do leave scar. Cure it internally. 2. Question:- How does spritual connect benefits you in your societal and domestic relationships?? Answer: Everybody is in search of good companian, good Friends and people with whom he or she can hangout at their ease. This desire of "my ease" tends person to customize people around. And as and when you started customizing people, it just started destorying your comfort and peace of mind. And most amazing thing is, this process is so subtle that person just cant realize what ...

आज की मुरली 22.06.2022

आज की ज्ञान चर्चा अधूरी रही। गुरु श्री अपने साकार स्वरूप में मधुबन में उपस्थित नहीं थी। कई बार मन में हुआ कि आज क्या चलें? परंतु गुरु श्री ने अपनी बातों में कई बार कई प्रकार से यह प्रकट किया है के किसी भी शरीरी पर उतनी आस्था नहीं रखनी है जितनी शिवबाबा पर। ज्ञान और ध्यान के मूर्त स्वरूप बाबा ही है। परन्तु मुझे यह लगता है कि साकार के आलम्बन से ही निराकार की प्राप्ति के द्वार खुल सकते है। मेरे जीवन में शुभ परिवर्तन गुरुश्री के ही कारण आये है। इसलिए गुरुश्री साकार स्वरूप में मेरे लिए महत्वपूर्ण है। आज की मुरली पढ़कर यह समझा कि इस युग में परमात्मा अपने आने वाले कल्प के लिए फाउंडेशन तैयार कर रहे हैं। इसके लिए बाबा को विचारवान, आज्ञाकारी बच्चों की आवश्यकता है। मुझे यह समझ में आता है की यह एक प्रगतिशील विचार है, जो आज की लौकिक परिस्थितियों में सारवान है। हम अपने जीवन में आसपास, समाज में देखते हैं कि अक्सर बुरे तत्व एक साथ संगठित रूप में रहते हैं। सत्य की राह पर चलने वाले विचार वान लोग अकेले पड़ जाते हैं। यह भी सुना है "संघे शक्ति कलियुगे"। कलियुग में संगठन बड़ी शक्ति है। यह भी सुना है...

आज की मुरली 21.06.2022

आज चर्चा इस बात से शुरू हुई कि हमें यह ध्यान में रखना है कि यह संसार या जो कुछ भी हमें दिख रहा है वह नष्ट हो जाने वाला है। अतः हमें उसके लिए प्रयास करना है जो हमें आगे मिलेगा। मुझे लगता है की यह बात बार-बार, अनेक प्रकार से उल्लेख करके, बाबा हमें यह जताना चाहते हैं कि हम किसी भी प्रकार का मोह किसी से भी ना रखें। इसे दूसरी तरह से देख सकते है। जैसे अगर किसी को यह विश्वास हो जाए कि यह जो कुछ भी संसार में दिखाई पड़ रहा है वह एक दिन नष्ट हो जाएगा। तो उसके मन से यह बात निकल जाएगी कि मैं यह बना लूं या वह बना लूं। मैं ऐसा महल बना लूं या मैं वैसा किला बना लूं। व्यक्ति वही करेगा जो उसके लिए जरूरी होगा और समाज के लिए शुभ होगा। उसके अंदर से भोग करने की वृत्ति नष्ट हो जाएगी। गुरु श्री कहती हैं की हमें हद से बेहद की ओर चलना है । हमारी दृष्टि बेहद को समझने वाली होनी चाहिए। आज इस बात को समझ कर मैंने अपनी मौसेरी बहन को समझाया। हमारी बात इस भाव को लेकर हुई कि क्या परमात्मा हमारे दुख तकलीफों को जानता समझता है या नहीं? हद को समझने में उदाहरण के तौर पर हम यह ले सकते हैं कि बच्चे के माता पिता एक दृष्टि में ब...

आज की मुरली 19.06.2022

आज सुबह की मुरली गुरुश्री ने सुनायी। गुरुश्री कहती है कि हमें नित्य प्रति कायातीत होने का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिये परमात्मा को याद करते हुए योग में बैठना और अपने आत्म स्वरूप को महसूस करना चाहिए।  कायातीत होने का परिणाम होगा कि हम किसी भी कार्य को इस रूप में करेंगे जैसे कोई और ही कर रहा है। यह अवस्था तब आएगी जब हम हर कार्य परमात्मा को अर्पित करते हुए करेंगें। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। लेकिन गुरुश्री कहती है कि ऐसे में भी हमे सचेत रहना है। अपने कर्म से मुँह नही मोड़ना है। गुरुश्री कहती है कि इस स्लोगन को हमेशा याद रखना है और आचरण में भी लाना है:-- "सुख देना है और सुख लेना है। दुःख न तो देना है और न ही लेना है।" गुरुश्री बताती है कि हम अभ्यास करके स्लोगन के पहले हिस्से को तो अपना लेते है लेकिन दूसरे को नही अपना पाते। दूसरे हिस्से को निश्चय पूर्वक अपनाना है। मुझे लगता है कि जब सभी को परमात्मा के बच्चे के रूप में देखने की निगाह आ जायेगी। तब अपने आप किसी की बात से दिल दुखना बंद हो जाएगा। जैसे हमारी कानून की किताब में भी अबोध बच्चे द्वारा और नशे या पागलपन की हालत में व्...

आज की मुरली 18.06.2022

आज की चर्चा  में गुरुश्री को आज की मुरली से जो सत्व संग्रहित हुआ उसके बारे में बताया। ब्रम्हा बाबा कहते है कि स्वयं को ट्रस्टी समझकर आचरण करो। देहाभिमानी न बनो, आत्मभिमानी बनो। परमात्मा की याद से अपने विकर्मों को समाप्त करो। काम महाशत्रु हैं। पवित्रता ही वह साधन है जिससे मन सदैव आनन्द की अवस्था में रह सकता है। अंदर और बाहर से एक हो जाता है। वृत्ति, दृष्टि, बोल व चलन सत्य आधारित हो जाते है। गुरुश्री आत्मभिमानी बनने से तात्पर्य आत्मा की चेतना होना, से लगाती है। इस बात की चेतना होने भर से कि मैं एक सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ, व्यक्तित्व में निर्मलता आ जाती है। आत्मा की चेतना होने से ही ट्रस्टीशिप का आविर्भाव हो जाता है। यह समझ लेना कि इस देह और इस देह से जुड़े हुए संबंध मेरे नही है। मेरा एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मा से है। इस जगत में आकर मुझे अपना पार्ट अदा करना है। और यह प्रयास करना है कि यह पार्ट अच्छे से अदा हो। मैं यह सोचता हूँ कि यह सही बात है। हम किसी कार्य को करते समय जब अपनी व्यक्तिगत भावना उस कार्य से अलग रखते है तो हम कर्त्तव्य निर्वहन अच्छे से कर सकते है। न्यायालय के कार्...

प्रायश्चित

आज की मुरली 17.06.2022 आज की चर्चा में प्रारंभ इस बात से हुआ कि कैसे व्यक्ति विकर्माजीत बन सकता है? विकर्माजीत, यह शब्द मेरे लिए नया है। गुरु श्री बताती हैं इसका अर्थ होता है कि अपने पाप कर्म अर्थात विकर्मों का प्रायश्चित करके उनसे मुक्त हो जाना। इस प्रायश्चित के रास्ते में कई ऐसे पड़ाव आएंगे जब तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे साथ कुछ ऐसा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। तो समझ लेना की हिसाब चुकता हो रहा है। मेरे इस कथन पर कि मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन में पाप कर्म जैसा कुछ नहीं किया हुआ है। ऐसा हो सकता है कि कुछ भूल चूक हुई हो, कुछ बातें खराब हुई हो, किसी का दिल दुखा हो, परंतु कुछ भी जानबूझकर हानि पहुंचाने की दृष्टि से नहीं किया गया है। गुरु श्री कहती हैं कि जब आप ईश्वर को अपने सामने रखकर उसकी याद में, उसके ध्यान में, अपनी बातें कह रहे हैं तो आपको यह भी ध्यान में लाना होगा कि पाप कर्म या विकर्म का रूप ऐसा साधारण नहीं होगा। गुह्य रूप होगा। उदाहरण के तौर पर वह पवित्रता की चर्चा करती हैं। महाभारत की एक कथा जिसमें यह कहा गया कि एक बार वन में भ्रमण करते हुए पांडवों ने देखा की एक फल टूट कर डाली...

आज की मुरली 16.06.2022

आज की चर्चा इससे बात के साथ प्रारंभ हुई कि अशरीरी बनो और अशरीरी के साथ अपने नाते को जोड़ो। क्योंकि ऐसा करना ही तुम्हें सुख वास्तविक सुख प्रदान करेगा। अशरीरी का अर्थ सामान्य तौर पर यह है कि जिसका शरीर ना। तो हम इसको आत्मा और परमात्मा से जोड़ सकते हैं। गुरु श्री कहती हैं कि अशरीरी का अर्थ गहरे स्तर पर समझना होगा। परमात्मा के संदेश या उस तक पहुंचने का रास्ता, हमें किसी न किसी शरीरी या व्यक्ति के माध्यम से ही मिलेगा। परंतु हमें वह शरीर, जो हमें उस रास्ते को पहुंचा रहा है, उसके मोह में नहीं बंधना है। उसका मोह भी उसी प्रकार दुख का कारक होगा जैसे अन्य मोह होते हैं। यह बात कही जाती है की इस जन्मों में किए गए धर्म के कार्य हमें अगले जन्म में उच्च पद प्राप्त करायेंगे। उच्च पद और अच्छा जीवन जब भी संदर्भित होता है तो सतयुग को आदर्श रूप में रखा जाता है। गुरु श्री कहती हैं कि यह आत्मा कई बार इस धरती पर जन्म लेकर आ चुकी है। यह सतयुग में भी थी, उसने सतयुग को भोगा है। इसी कारण उस युग के संस्कार भी आत्मा पर पडे हुए हैं। यह कारण है कि जब कोई भी दार्शनिक सुंदर समाज का चित्र खींचता है तो वह कहीं न कहीं उसी...

आत्म चेतना के सफ़र की शुरुआत

आज की मुरली आज मधुबन में चर्चा की शुरुआत इस बात से हुई की वानप्रस्थ का समय नजदीक आने वाला है तो अपने जितने भी पुराने बही खाते हैं, उन्हें बंद कर लो। वानप्रस्थ प्रज्ञा प्राप्त करने की अवस्था है। वह अवस्था जहाँ बोलने की आवश्यकता नही पड़ती। विचार व संकल्प शक्ति ही पर्याप्त होती है। इस बात को हम कुछ गहराई में उतर कर देखें तो यह बड़ी गूढ़-गंभीर बात है। व्यक्ति को हमेशा इस तैयारी में रहना चाहिए कि कब आगे बढ़ने की, बाहर निकलने की, यात्रा की घड़ी आ जाए। ऐसे में यदि पुराने बही खाते खुले रहेंगे। पुराने हिसाब बाकी रहेंगे तो आगे की यात्रा सुगम नहीं हो सकती है। इस यात्रा को हम कई संदर्भों में ले सकते हैं। हर संदर्भ में यह व्यवहारिक और उचित जान पड़ेगा कि चलने से पहले पुराने सारे हिसाब चुकता कर लिया जाए। हिसाब चुकता करने को लेकर गुरुश्री की बात सु-स्पष्ट है। यह एक ही तरीके से हो सकता है। अपनी भूलों के लिए क्षमा मांग कर और दूसरों की भूलों पर उनको क्षमा करके। आत्म शुद्धि हेतु यह आवश्यक है की हमारा मन हमारी बुद्धि और हमारी वाणी विकार रहित हो। इसके लिए गुरुश्री सिर्फ एक सुगम रास्ते पर चलने हेतु निर्देशित क...

शिव बाबा सूत्रम

1. मन पर नज़र बनाये रखना। मन के विचारों को तटस्थ भाव से यह समझकर देखना कि मैं एक आत्मा हूँ। 2. थोड़े अंतराल पर आत्म शुद्धि हेतु तत्पर होना। जिस प्रकार किसी वाहन की समय समय पर सर्विस करवानी पड़ती है। ठीक उसी प्रकार आत्म शुद्धि हेतु भी प्रयास रत रहना चाहिये। 3. दूसरों के गुण दोषों का आकलन करना छोड़कर अपने भीतर झाँकना ज्यादा आवश्यक है। शुभ देखने की आदत बनाना और अपने अंदर की बुराइयों को खोज खोज कर समाप्त करना ही शुभ कर्म है। 4. सृष्टि चक्र अनवरत चलता रहता है। मनुष्य अपने जन्म को वापस जियेगा। कर्म फल का सिद्धांत फलीभूत होता है। कर्म के फल की प्राप्ति की निश्चित अवधि नही है। पुनर्जन्म भी इसी से जुड़ा हुआ है। जो भी घटित हो रहा वो सब शुभ है, इसी विचार को धारण करके अपने आस पास व अपने साथ घटित होने वाली घटनाओं को देखना है। 5. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, ये पाँच विकार है जिनपर जय पाने हेतु निरन्तर प्रयास में लगे रहना है। ये विकार भी अपने में शुभ और अशुभ होते है। उसकी पहचान करनी है। (प्रजापिता ब्रह्मा ईश्वरीय विश्वविद्यालय की दलसिंहसराय, समस्तीपुर, बिहार शाखा में गुरुश्री द्वारा प्रारम्भ के 5 दिनों...

हीरा जनम अमोल सा, कौड़ी बदले जाये

आज की मुरली आज मधुबन में चर्चा की शुरुआत इस पद से हुई:- रात गवा यी सोए के, दिवस गवाया खाए हीरा जन्म अमोल सा, कौड़ी बदले जाए।। हम इस धरती पर किस लिए आए थे और किन कामों में उलझ के रह गए। क्या हम वही काम कर रहे हैं जो हमें करना चाहिए या हम व्यर्थ के जंजालों में उलझे हुए हैं। मैं इसको एक उदाहरण के माध्यम से देखता हूं। यदि हम अपने दिनचर्या को ही लें और यही मानकर चलें कि जो हमारा काम है वही काम करने के लिए हम आए हैं। अपनी दिनचर्या के एक-एक क्षण को, दिन भर में किए गए अपने एक एक काम को, मन में आए अपने एक एक संकल्प को, विचारों को, सामने रखकर सोचे तो क्या हम यह पाते हैं की हमारा दिन भर का हर कार्य उस दिशा में था जिस दिशा में होना चाहिए था। मैं देखता हूं कि मैं अपने कार्यालय समय के अतिरिक्त बाकी समय को नजर में रखूं तो 70% कार्य ऐसे होंगे जो मेरे काम से तालुक्कात नहीं रखते। ये ऐसे गैर जरूरी काम है जो नहीं भी किए जाते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। इसका अर्थ है कि वास्तव में हम गैर जरूरी में अपना बहुत सारा वक्त, अपनी बहुत सारी ऊर्जा क्षय कर देते हैं। इसी को हम और बड़े पैमाने या संदर्भ में देखेंगे तो ...

नीति : व्यवस्था परिवर्तन

जीवन के किसी भी क्षेत्र में कार्य करते हुए यदि हम कुछ परिवर्तन करना चाहते हैं। यदि हम चाहते हैं की जो प्रक्रिया अथवा व्यवस्था चल रही है उसमें ऐसे परिवर्तन किए जाएं, जिनसे प्रक्रिया गत या व्यवस्था में आए हुए दोष दूर हो। यह करते हुए, तमाम शुभ इच्छाएं मन में रहते हुए भी, हमें परिवर्तन का प्रयास करते समय, यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि जो व्यवस्था विद्यमान है वह कहीं ना कहीं लोगों द्वारा, जनता द्वारा मान्य है। जनता और उस व्यवस्था के अंग, उस व्यवस्था में सहज हो चुके हैं। ऐसे में परिवर्तन हेतु अचानक से शीघ्रता पूर्वक कदम नहीं उठाने चाहिए बल्कि धीरे-धीरे व्यवस्था को नई पद्धति में जनता को नए ढंग में ढलने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। जैसे जब कभी हम दूध उबालते हैं तो यदि दूध तेज आंच पर उबाला जाए तो जरा सा भी ध्यान भटकने पर दूध के बह जाने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। वहीं पर धीमी आंच पर दूध उबालने पर, हम पूरी तरह से यदि हम उतने सावधान न भी रहे तो दूध के बर्तन के बाहर आने की संभावना नगण्य होती है। दूध का गर्म किया जाना यदि व्यवस्था का परिवर्तन है तो आंच का तेज या कम रखा जाना हमारी तरफ से कि...

परमात्मा की कृपा और आध्यात्मिक उन्नति

आज की मुरली  13.06.2022    आज दो तीन दिनों के भटकाव के बाद आज मैं मुरली में सम्मिलित हुआ। यहाँ आकर यह महसूस हुआ की जैसे कुछ दिनों से कुछ छूटा हुआ सा था, कुछ कम था। आज जो ज्ञान गुरूश्री ने दिया उसको मैं इस प्रकार समझ पाया हूँ। जीवन एक पाठशाला है जिसमें हर व्यक्ति का यह उत्तरदायित्व है कि वो अच्छी और ज्ञान की बातों को सीखने का प्रयास करें और उन्हें दूसरों तक भी पहुँचाये। यहाँ संसार में हर व्यक्ति अपनी भूमिका में है। संसार के रंगमंच पर हर कोई अपना उत्तरदायित्व लेकर आया है और अपनी भूमिका निभा कर जाएगा। तो किसी के जाने का कोई शोक भी करना। न ही अपने जीवन से और न ही संसार से। मनुष्य जीवन का ध्येय नर से नारायण बनने का प्रयास करने का है। इस दिशा में बढ़ना वैष्णव होना हैं।वैष्णव होने से सिर्फ़ यह मतलब नहीं हैं कि बाहरी आचार विचार में परिवर्तन लाना बल्कि ये उस पवित्रता को प्राप्त करने का प्रयास होना चाहिए जब आपके मन में भी कोई बुरा संकल्प न आने पाये। आप सबका अच्छा सोचे और क्षमा को जीवन में धारण करें। परमात्मा की कृपा की छाया को महसूस करें और उसकी प्राप्ति के निमित्त अपने आपक़ो तैयार...

परमात्मा से संबंध और मन का सुंदरीकरण

आज की मुरली 09.06.2022 जिस प्रकार से हम अपने स्वजनों से, रिश्तेदारों से संपर्क में रहते हैं; मित्रों के संपर्क में रहते हैं उसी प्रकार से परमात्मा के संपर्क में रहना नहीं हो पाता है। यही कारण है कि जब हम अपने प्यारे परमात्मा को ध्यान में लाना चाहते हैं तो हम तत्कालिक रूप से नहीं ला पाते है। हमें आवश्यकता पड़ती है कुछ छवियों की, कुछ निरूपणों की, कुछ कर्मकांडो की, कुछ प्रकियाओं की। इतना सब करने के बाद भी हमें यह अनुभव होता है की हम वास्तव में उन छवियों, निरूपणों, कर्मकांडों और प्रक्रियाओं में ही उलझ कर रह गए। हम परमात्मा से कनेक्ट नहीं कर पाए। इसका कारण यह है कि हमने परमात्मा के स्थान को, परमात्मा के स्वरूप को समझने की जगह; उन बातों पर ज्यादा ध्यान दे दिया जो सिर्फ प्रक्रियागत थी, जो परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करने, परमात्मा से कनेक्ट करने का आयाम भर ही थी। हमने उन्हीं को जरूरत से ज्यादा महत्व देना प्रारंभ कर दिया। हम मूल बिंदु से दूर हटते चले गए। इस कारण होता यह है कि हम बिना सोचे समझे प्रक्रियाओं को पूरा करते चले जाते हैं। परन्तु अंदर अंदर मन के गहरे स्तर पर अ-धार्मिक रंग में रंगते चले...