करुणा और दया में अंतर
यदि हम शब्दकोश मैं इन दोनों शब्दों का अर्थ ढूंढ लेंगे तो कमोबेश दोनों समानार्थी दिखाई पड़ेंगे। परंतु दोनों ही शब्द जिन भावनाओं को निरूपित करते हैं उनके आधार और प्रभाव में सूक्ष्म अंतर है।
1. दोनों ही शब्द मनुष्य की मनोस्थिति को दिखलाते हैं। परंतु करुणा सदैव बनी रहने वाली या स्वभावगत मनोस्थिति है। दया की भावना उत्पन्न होती है किन्हीं परिस्थितियों में। उदाहरण के तौर पर:- एक करुणामय व्यक्ति किसी भी तरह की जीव हत्या नहीं रह पाएगा। वह मांसाहारी नहीं हो सकता। परंतु ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि एक मांसाहारी व्यक्ति को कभी-कभी उस जीव पर दया आ जाए जिसको मारने के बाद उसका भोजन तैयार होने वाला है। जैसे हमने कहीं कहीं देखा होगा चित्रों में कि शेर हिरण के बच्चे पर हमला नहीं कर रहा। यद्यपि वह करुणामय मन स्थिति का नहीं है।
2. एक विचारक कहते हैं दया कहीं ना कहीं अपने भीतर अहंकार को समाये रखती है। दया शब्द ही यह दर्शाता है कि उसमें दो पक्ष हैं। एक पक्ष सबल है, सामर्थ्य वान हैं और दूसरा दयनीय है। मजबूत व्यक्ति अपने से कमजोर पर दया दिखाता है। धनी व्यक्ति गरीब पर दया करके उसके सहायता कर देता है। परंतु करुणा वह भावना है जो सामने वाले के स्तर से प्रभावित नहीं होती है। वह जिस व्यक्ति में है, उसके लिए सामने वाले सभी समान रूप से करुणा के पात्र होते हैं। वह सब को उसी दृष्टि से देखता है चाहे वह सम्राट हो या प्रजा। हम इसीलिए पाते हैं कि बुद्ध और महावीर को दयावान के स्थान पर करुणावान शब्द से अलंकृत किया जाता है।
3. दया सदैव परिस्थिति जन्य होती है। करुणा सदैव बनी रहने वाली मनस्थिति है। इसको उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे कोई व्यक्ति दैनिक रूटीन में कहीं आने जाने के लिए हाथ रिक्शा को प्रयोग में लाता हूं। हाथ रिक्शा मतलब वह रिक्शा जिसे एक व्यक्ति शारीरिक बल से खींचता है ना की मोटर शक्ति से और दूसरा उसमें चढ़कर सवारी करता है। लेकिन सवारी कर रहे उस व्यक्ति को कभी इसमें कोई अचरज या कुछ असहजता महसूस नहीं हुई। परंतु किसी दिन किसी रिक्शावान को रिक्शा खींचते हुए देखकर, वो व्यक्ति रिक्शावान से सहानुभूति अनुभव करने लगता है। तो यह जो भावना उसके मन में उत्पन्न हुई, उसको दया कहेंगे, करुणा नहीं कहते। यदि करुणा उसके मन में होती तो शायद प्रत्येक रिक्शा वाले के प्रति सहानुभूति की भावना उसके मन में उत्पन्न होती।
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प्रियदर्शी प्रतीक
30.06.2022
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