आज की मुरली 19.06.2022

आज सुबह की मुरली गुरुश्री ने सुनायी। गुरुश्री कहती है कि हमें नित्य प्रति कायातीत होने का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिये परमात्मा को याद करते हुए योग में बैठना और अपने आत्म स्वरूप को महसूस करना चाहिए। 

कायातीत होने का परिणाम होगा कि हम किसी भी कार्य को इस रूप में करेंगे जैसे कोई और ही कर रहा है। यह अवस्था तब आएगी जब हम हर कार्य परमात्मा को अर्पित करते हुए करेंगें। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। लेकिन गुरुश्री कहती है कि ऐसे में भी हमे सचेत रहना है। अपने कर्म से मुँह नही मोड़ना है।

गुरुश्री कहती है कि इस स्लोगन को हमेशा याद रखना है और आचरण में भी लाना है:-- "सुख देना है और सुख लेना है। दुःख न तो देना है और न ही लेना है।" गुरुश्री बताती है कि हम अभ्यास करके स्लोगन के पहले हिस्से को तो अपना लेते है लेकिन दूसरे को नही अपना पाते। दूसरे हिस्से को निश्चय पूर्वक अपनाना है।
मुझे लगता है कि जब सभी को परमात्मा के बच्चे के रूप में देखने की निगाह आ जायेगी। तब अपने आप किसी की बात से दिल दुखना बंद हो जाएगा। जैसे हमारी कानून की किताब में भी अबोध बच्चे द्वारा और नशे या पागलपन की हालत में व्यक्ति द्वारा किये गए अपराध पर दंड देने का प्रावधान नहीं हैं। तो संसार मे जिसको भी परमात्मा के सच्चे स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाया है उसे नशे या पागलपन की हालत वाले व्यक्ति की भांति ही समझना चाहिए। फिर ऐसे व्यक्ति के कार्य पर क्या ही दुःखी होना।

गुरुश्री कहती है कि मनुष्य को पुण्य अर्जित करने चाहिए। और यह पुण्य हर अच्छे कार्य से अर्जित हो जाये, ऐसा नहीं है। जैसे कोई दान करते समय यदि दिखावा मन में रहा तो वह दान तो होगा लेकिन वह पुण्य कर्म नहीं होगा। में इस बात को लेकर सोच रहा था कि मैं भीं जब कहीं दान करता हूँ तो मन में रहता है कि जिसको दे रहा उसको पता रहे कि मैं दे रहा। जब तक इस  "मैं" से मुक्ति नही होगी तब तक परमात्मा से एकाकार नही हो सकेंगे।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
19.06.2022

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