नैराश्य में प्रकाश

मन व्यथित है, चेतना के द्वार पर लटके है ताले;
उत्तरों की खोज में बहता ये मन कैसे संभाले।

सत्य के अभ्यास में बस वेदना सहनी पड़ी;
जग थमाता है सदा सुकरात को जहरों के प्याले।

जब किसी मंतव्य को उसकी कसौटी पर कसो;
तब नजर आयेंगे काले मेघ में डूबे उजाले।

जो समझ के पार हो, वो बात उन पर छोड़ दो;
वो ही करें अब फैसला, तुमको डूबा दे या उबारे।।

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प्रियदर्शी प्रतीक
दलसिंहसराय, समस्तीपुरम
28.06.2022

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