मुरली दिनांक 24.06.2022
कल दिनांक 24.06.2022 की मुरली महावाक्य "कर्म ही सुख और दुख का कारण है" पर आधारित थी। इस बात को आधार रूप में रखा गया कि जीवन में दुख और सुख कर्म के आधार से प्रारब्ध रूप में चलते हैं। यह पहले के ही किए गए कर्म है जिनकी प्रारब्ध दुख हो या सुख के रूप में भोगनी होती है। तो ऐसे में सुख और दुख का संबंध कर्म से हो गया। इस बात को साफ किया गया कि कर्म कोई किस्मत नहीं है। परंतु मुझे लगता है कि कर्म जो पिछले जन्म में किए गए जिनका प्रारब्ध हमें भोगना है उसे किस्मत ही कहना चाहिए। वही किस्मत है। परंतु गूढ़ अर्थों में देखें तो वह किस्मत हमारे ही कर्म पर आधारित है इसलिए सूक्ष्म रूप में मातेश्वरी की बात सही है।
इस बात को साफ किया गया की जीवात्मा ही अपना शत्रु और अपना मित्र होता है। वही अपने सुख और दुख का कारण है। परमात्मा को सुख और दुख दोनों का कारक नहीं कहा जा सकता। इस बात को समझाने के लिए मातेश्वरी हमें समझाती हैं कि देखो जब हम कभी भी दुख में होते हैं तो हमें सबसे ज्यादा, सबसे पहले भगवान याद आते हैं। हम परमात्मा की याद करते हैं। तो क्या ऐसा हो सकता है कि हम उसको याद करें जिसके कारण हमें दुख हो रहा है। ऐसा तो नहीं होना चाहिए। इसलिए परमात्मा कोई दुख का कारण नहीं है।
मुझे लगता है यह बात सही है। यह उचित ही लगता है। ऐसा कोई कारण नहीं लगता कि हम सोचे कि परमात्मा हमें दुख हो इस उद्देश्य से कोई प्लानिंग, कोई फ्रेमवर्क या कोई प्रारूप तैयार कर रहा है। मुझे इस मौके पर भगत सिंह का लेख "मैं नास्तिक क्यों हूं" यह याद आता है। भगत सिंह ने अपने लेख में अपने नास्तिक होने के कारण गिनाए थे। उसमें उन्होंने सबसे बड़ा कारण यह दिया कि यदि परमात्मा जैसी कोई चीज होती तो हजारों हजार इंसान भूकंप में, प्लेग से, महामारी से, अकाल से, आपस में लड़ के क्यों मर रहे होते!!! उन्होंने कहा यदि परमात्मा जैसी कोई सत्ता होती तो क्या वह अपने बच्चों को, अपने प्यारों को क्यों इस तरह दुख झेलने पर मजबूर करती!!! इसे आधार रखकर भगत सिंह ने कर्म के सिद्धांत को तो मान लिया। परंतु परमात्मा के अस्तित्व को सिरे से खारिज कर दिया। आज की मुरली में मातेश्वरी के वचनों से यह बात साफ होती है कि यदि कर्म का सिद्धांत है और आप उसको मान भी रहे हो तो कोई कारण ही नहीं बचता कि आप दुख के लिए परमात्मा की ओर उंगली उठाओ।
यहां पर एक उलझन खड़ी होती है। जो दुख हम अपने जीवन में खेलते हैं उसमें कई दुख तो साफ-साफ ऐसे होते हैं जो हमारे कर्मों द्वारा प्रकट किए गए होते हैं। जैसे पारिवारिक लड़ाई, आपसी संबंध की खींचातानी इत्यादि। परंतु कुछ दुख के कारण ऐसे हैं जिसे हम सीधे व्यक्ति के कर्म से एक individual के कर्म से जोड़कर नहीं देख पा रहे हैं। जैसे भूकंप आ जाना, अकाल में अन्न की कमी से भूखे मर जाना इत्यादि। इसको हम सीधे सीधे व्यक्ति के कर्म से नहीं जोड़ पाते। ऐसे में हमें इसको मनुष्य के प्रालब्ध से जोड़ कर देखना पड़ता है।
इस बात को मैं कर्म बंधन से जुड़ा हुआ इस प्रकार से देख पाता हूं। आज के शिक्षा प्रणाली में, वैज्ञानिक अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है की मनुष्य व सभ्यता ने उत्तरोत्तर विकास किया है। हम पहले आदिम युग में थे। फिर हमने धीरे धीरे आगे बढ़कर अपने ज्ञान को संचित करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सुनिश्चित किया। इस प्रक्रिया में मनुष्य अपने श्रम और पिछली पीढ़ी के ज्ञान को एक साथ रखकर आगे बढ़ता चला गया। परंतु पशु व अन्य जीव ऐसा नहीं कर पाए। इसका मूल कारण यही था कि मनुष्य अपने अर्जित ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचा पाया। हमने भाषा और लेखन को विकसित कर लिया था। ज्ञान को सहेजना सिख लिया था। यदि यह सब परमात्मा या शक्ति द्वारा रचा गया होता तो परमात्मा जैसी शक्ति उसे एक ही बार में विकसित स्तर पर बना करके हमें दे दी होती। जैसा परमात्मा ने प्रकृति के मूल तत्वों के साथ किया। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और हवा, ईश्वर ने यह बनाया और यह अभी भी वैसे ही तत्व है। इनके मूल स्वरूप में मैं कोई परिवर्तन नहीं देखता हूँ। जहां अन्य चीज़ों का संबंध है। मनुष्य ने मूल तत्वों को अपने ज्ञान के हिसाब से प्रयोग में लाना शुरू किया। जैसे मनुष्य ने पहले एक पहिए की साइकिल बनाई। फिर दो पहिए की बनाई। फिर उसमें मोटर लगवाई मोटरसाइकिल बनायी। फिर भाप की शक्ति का पता चला। इंजन का आविष्कार हुआ। चार पहिए की सवारी बनी और उत्तरोत्तर नवीन प्रयोगों के साथ development चलता रहा है। परमात्मा को ही सब कुछ करना था तो उसने सबसे विकसित अवस्था वाली कार पहले ही बना दी होती। तो इतना तो निश्चित है की परमात्मा ने हमें कर्म करने की पूरी छूट दे रखी है। और उन्हीं कर्म बंधनों से हमारी आत्मा जकड़ी हुई है।
मातेश्वरी यह बताती हैं कि दुख का कारण माया है। माया को हम कोई अन्य चीज़ न समझे बल्कि पांच विकार ही माया है।
परमात्मा के सृष्टि की कोई चीज़ खराब नही है। हम अज्ञानता वश सब चीजों को माया ही समझ लेते हैं। हम सोच लेते हैं कि धन-संपत्ति माया है। हम इस शरीर को ही माया कह देते हैं। परंतु यह माया नहीं है। धन-संपत्ति में जब पांच विकार जुड़ जाते हैं तब वह अशुद्ध हो जाती है तब वह हानिप्रद हो जाती है।
तो यह बात साफ है कि अपने सुख और दुख का कारण मनुष्य स्वयं है। मनुष्य ने ही वह कर्म किए हैं जिसका फल उसे भोगना पड़ रहा है। यदि हम इसको देखें। हम अकाल का ही उदाहरण ले लें। वर्षा समय पर नहीं हुई, कृषि नहीं हो पाई, अनाज की कमी हो गई, अकाल पड़ गया। तो यह सोचो कि जो यह हुआ उसमें मनुष्य का मनुष्य की कितनी बड़ी भूमिका है। चाहे ऋतु परिवर्तन की बात कर लें, चाहे पर्यावरण प्रदूषण की बात कर ले, वन की समाप्ति की बात कर ले, बेतरतीब बढ़ती हुई आबादी की बात कर ले। तो इनका कारण हम देखेंगे कि मनुष्य स्वयं है।
अब एक बात दिमाग में आती है की इंडस्ट्री लगाने वाला मनुष्य जो पाप करता है पर्यावरण को प्रदूषित कर करके, उसका भुगतान बाकी सब को क्यों करना पड़ रहा है!!! इस मुद्दे पर मुझे लगता है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहना होगा। जो व्यक्ति हवा प्रदूषित होने की शिकायत करता है उसे यह देखना होगा कि उसने कितने पेड़ लगाये। और जो व्यक्ति इस जन्म में प्रदूषण फैलाने के बाद भी प्रदूषण के दुष्प्रभाव से स्वयं को बचा ले रहा है तो समझो कि पूर्वजन्म में उसने बहुत बगीचे लगाए है। पर अब के कर्मों का भोग तो उसे करना ही पड़ेगा।
मातेश्वरी कहती है कि इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि यह सब अव्यवस्था व दुख का कारण "मैं" का भाव है। यह मेरा है, वह मेरा है।
मेरा- मेरा के भाव से बाहर निकलकर, विकारों को स्वयं से दुर रखकर, अपने पूज्यस्वरूप की स्मृति से हमेशा रूहानी नशे में रहना ही जीवन मुक्ति है। वही सच्चा परमानंद है।
!!ॐ शांति!!
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प्रियदर्शी प्रतीक
24.06.2022
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