आज की मुरली 16.06.2022
आज की चर्चा इससे बात के साथ प्रारंभ हुई कि अशरीरी बनो और अशरीरी के साथ अपने नाते को जोड़ो। क्योंकि ऐसा करना ही तुम्हें सुख वास्तविक सुख प्रदान करेगा। अशरीरी का अर्थ सामान्य तौर पर यह है कि जिसका शरीर ना। तो हम इसको आत्मा और परमात्मा से जोड़ सकते हैं। गुरु श्री कहती हैं कि अशरीरी का अर्थ गहरे स्तर पर समझना होगा। परमात्मा के संदेश या उस तक पहुंचने का रास्ता, हमें किसी न किसी शरीरी या व्यक्ति के माध्यम से ही मिलेगा। परंतु हमें वह शरीर, जो हमें उस रास्ते को पहुंचा रहा है, उसके मोह में नहीं बंधना है। उसका मोह भी उसी प्रकार दुख का कारक होगा जैसे अन्य मोह होते हैं।
यह बात कही जाती है की इस जन्मों में किए गए धर्म के कार्य हमें अगले जन्म में उच्च पद प्राप्त करायेंगे। उच्च पद और अच्छा जीवन जब भी संदर्भित होता है तो सतयुग को आदर्श रूप में रखा जाता है। गुरु श्री कहती हैं कि यह आत्मा कई बार इस धरती पर जन्म लेकर आ चुकी है। यह सतयुग में भी थी, उसने सतयुग को भोगा है। इसी कारण उस युग के संस्कार भी आत्मा पर पडे हुए हैं। यह कारण है कि जब कोई भी दार्शनिक सुंदर समाज का चित्र खींचता है तो वह कहीं न कहीं उसी जीवन और समाज की परिकल्पना करता हैं जो सतयुग में था। सत्य का आचरण, धर्म का शासन। मैं इसे इस प्रकार से देखता हूं कि कोई कितने भी असत्य व्यापार में क्यों ही ना लगा हो लेकिन उसकी आस्था अंततोगत्वा सत्य में ही होती है। सत्य आचरण की ही वह अपेक्षा करता है। हर व्यक्ति दूसरों से सत्य की ही अपेक्षा कर रहा है। उसी की अपेक्षा करते हैं किसको कहीं ना कहीं हम अच्छा महसूस कर चुके हैं।
लेकिन इतना होने पर भी हम देखते हैं समाज विकृत रूप में है। प्रश्न उठता है कि जब सभी आत्माओं पर सतयुग की छाप पड़ी हुई है तो फिर हर आत्मा उसी दिशा में है क्यों नहीं प्रयत्न करती? मुझे लगता है इसके पीछे कर्म फल के सिद्धांत को रखा जा सकता है। समझ में नहीं आता है इस संदर्भ में क्या सत्य है।
यह बताया गया कि मुक्ति का प्रयास हम सभी को अपने अपने स्तर पर व्यक्तिगत तौर पर करना होगा। कोई और बिना हमारे प्रयास किए सिर्फ उसकी शरण में चले जाने से हमें मुक्त नहीं कर सकता।
ब्रह्मा बाबा कहते हैं कि इसका रास्ता यह है कि अपने आप को लौकिक जीवन में रखते हुए भी शरीर से डिटैचमेंट की तरह प्रयास करना। गुरु श्री कहती हैं की शरीर से डिटैचमेंट का अर्थ है शरीर के और इसके प्रति संबंधों के प्रति मोह भाव से दूर होना। मोह ग्रस्त न होना किसी भी शरीर के प्रति। मैं देखता हूं यह बात सर्वथा सत्य है। हम किसी भी रिश्ते में, यदि अपने आप को इस तरीके से जोड़ लेते हैं कि उससे अपना सब कुछ समझने लगते हैं तो यह बात कालांतर में असत्य और दुखदाई ही साबित होती है। सांसारिक दुनिया में यह बात देखी गई की व्यक्ति को अपने हर संबंध में सजग रहना पड़ता है। ऐसे में परमात्मा से संबंध ही वह संबंध रह जाता है जिसमें हम careless होकर भी उन्मुक्त हो सकते हैं।
अंत में यह बताया गया की किसी अन्य व्यक्ति से प्रशंसा की अपेक्षा रखना ही दुख का कारण होता है। इस बात का मैं बहुत गहरे स्तर पर समर्थन करता हूँ। मुझे लगता है कि हम जो काम करते हैं, कहीं न कहीं दूसरों से उसकी प्रशंसा की अपेक्षा रखते हैं। हम जो कुछ भी हैं या कर रहे हैं उसका रिस्पॉन्स, उसकी प्रतिक्रिया, दूसरों की नजरों में देखना चाहते हैं। और ऐसे में निराशा हाथ लगना अत्यंत साधारण बात है क्योंकि हर व्यक्ति यही चाह रहा है। और हो यह रहा है कि कोई किसी की प्रशंसा नहीं कर रहा सब एक दूसरे में अपनी प्रशंसा खोज रहे हैं। मैं महसूस करता हूं की जब मैंने कोई अच्छी बात पड या सुनी या कुछ अच्छा मिला तो उसको व्हाट्सएप स्टेटस पर लगा दिया कहीं ना कहीं दिमाग पर दिमाग में यह बात घूमती रहती है किसे कितने लोगों ने देखा किसका किसका रिस्पॉन्स आया कौन क्या कह रहा है।
अभी तक यह बात आम तौर पर सुनी थी कि किसी से अपेक्षा नही करनी चाहिए। अपेक्षा करोगे तो उम्मीद बनेंगी। और उम्मीद पूरी न होने पर दुःख होगा, खिन्नता आयेगी, क्रोध आयेगा। लेकिन यदि यह बात मन मे बैठ गयी कि अन्य बात तो छोड़ दो, किसी से प्रशंसा की भी अपेक्षा नही करनी। तो समझो कि किस प्रकार से निर्लिप्त भाव से आप कार्य संपादन करोगे। और वो कितना शुभ और सुखकारी होगा।
प्रशंसा के भाव से मुक्त होकर सम्यक दृष्टि रखते हुए परमात्मा को समर्पित करने के उद्देश्य से किया गया काम ही अंतर में सुख व शांति की अनुभूति प्रदान करेगा।
!!ओम शांति!!
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प्रियदर्शी प्रतीक
16.06.2022
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