हीरा जनम अमोल सा, कौड़ी बदले जाये

आज की मुरली

आज मधुबन में चर्चा की शुरुआत इस पद से हुई:-

रात गवायी सोए के, दिवस गवाया खाए
हीरा जन्म अमोल सा, कौड़ी बदले जाए।।

हम इस धरती पर किस लिए आए थे और किन कामों में उलझ के रह गए। क्या हम वही काम कर रहे हैं जो हमें करना चाहिए या हम व्यर्थ के जंजालों में उलझे हुए हैं। मैं इसको एक उदाहरण के माध्यम से देखता हूं। यदि हम अपने दिनचर्या को ही लें और यही मानकर चलें कि जो हमारा काम है वही काम करने के लिए हम आए हैं। अपनी दिनचर्या के एक-एक क्षण को, दिन भर में किए गए अपने एक एक काम को, मन में आए अपने एक एक संकल्प को, विचारों को, सामने रखकर सोचे तो क्या हम यह पाते हैं की हमारा दिन भर का हर कार्य उस दिशा में था जिस दिशा में होना चाहिए था। मैं देखता हूं कि मैं अपने कार्यालय समय के अतिरिक्त बाकी समय को नजर में रखूं तो 70% कार्य ऐसे होंगे जो मेरे काम से तालुक्कात नहीं रखते। ये ऐसे गैर जरूरी काम है जो नहीं भी किए जाते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। इसका अर्थ है कि वास्तव में हम गैर जरूरी में अपना बहुत सारा वक्त, अपनी बहुत सारी ऊर्जा क्षय कर देते हैं।
इसी को हम और बड़े पैमाने या संदर्भ में देखेंगे तो पायेंगे कि सच में हीरा जन्म अमोल सा, कौड़ी बदले जाए।

गुरुश्री हद और बेहद की बात को समझाती हैं। बेहद के स्तर पर उतरने पर जब आदमी अपनी सोच को इतना विस्तृत कर देता है कि छोटी हदों में नहीं बांधा जा सकता है। तब वह परमात्मा के स्वरूप को समझ सकता है।

इस प्रक्रिया में दुनिया भी चीजों से वैराग्य होना एक महत्वपूर्ण चरण है। लेकिन यह वैराग्य क्षणिक या श्मशानी वैराग्य नहीं होना चाहिए। यह वैराग्य भक्ति और ज्ञान के प्राप्त होने के पश्चात का होना चाहिए। सब कुछ समझ कर जानकर दुनियावी चीजों से मन को ऊपर उठा देना वैराग्य की सही स्थिति होती है। भक्ति प्रथम चरण है जो ज्ञान से संपुष्ट होने पर मन को वैराग्य की तरफ ले चलती है।

गुरुश्री आगे कहती है कि ऐसा हो जाने पर आपकी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। बल्कि और बढ़ जाती है। आपको और दायित्व मिलते हैं। आपका दायित्व होता है कि आप अन्य लोग जो इस प्रक्रिया में छूट गए हैं। जो अभी भी वास्तविक सत्य को पहचान नहीं पाए हैं, उन्हें जगाना। इसे ब्रह्मा बाबा साल्वेशन ब्रिगेड के रूप में कहते आए हैं।

अंत में, परमात्मा से अपने संबंध को समझना और उसके चिंतन में लगे रहना एवं सारी चिंताएं व समस्याएं उसी के ऊपर छोड़ देना ही भक्ति की प्रथम सीढ़ी है। हम जब ऐसा करते हैं तो परमात्मा हमें अपने बच्चे के समान स्वीकार करते हुए हमारे अपराधों को क्षमा करता है और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

!!ओम शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
14.06.2022

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