मुरली 27.06.2022

आज ज्ञान वार्ता में अविश्वास के बादल छाए हुए थे। अविश्वास के स्वर है जिन्हें मैंने अपने ब्लॉग में चिन्हित किया था। उन्हीं स्वरों का नाद ज्ञान वार्ता में छाया रहा।

गुरु श्री इस बात को लेकर असहज थी कि कोई इतना अविश्वास लेकर किस प्रकार से विश्वास प्रदर्शित कर सकता है। मैंने अपना पक्ष रखने की कोशिश की, कि "मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।"

लेकिन विश्वास का तंतु बड़ा लचीला होता है। एक बार हिल जाने पर उसमें बहुत समय तक तरंगे उठती रहती है। मुझे लगता है कि गुरुश्री का विश्वास मेरे ऊपर से उठ गया है। मैं समझता हूँ कि उन्हें यह लग रहा है कि अविश्वास की चादर ओढ़े हुए व्यक्ति कैसे विश्वास की प्रशांति महसूस कर सकता है।

मुझे लगता है कि मैंने जिन चीजों को जाना है मधुबन में जाकर और जिन पर मेरा विश्वास हुआ है। वह मेरे लिए बहुत है। उतना ही मानने के बाद भी मेरा काम में इस विश्वविद्यालय में चल सकता है। मुझे नहीं लगता कि सारी की सारी बातें मान लेनी जरूरी है। वो भी तब जब मन उनकी सत्यता को महसूस नहीं कर पा रहा है। और जिसे मैं सत्य महसूस कर रहा हूं उसे अपनाने का भी प्रयास कर रहा हूं। मानना और अपनाना दो अलग अलग बातें है। कुछ बातें हैं जिन्हें मैं मान सकता हूं क्योंकि ऐसा बताया जा रहा है। और कहा जा रहा है कि यह मानकर चलने से आप को सहूलियत होगी। उदाहरण के तौर पर जैसे कोई कहे की आग में हाथ मत डालो क्योंकि जल जाओगे। जलने के डर को रखकर बात को माना जा सकता है। परंतु सत्यता तभी महसूस होगी जब हम आग की आंच को महसूस कर ले। तो जब तक मैं सत्यता महसूस ना कर लूं मैं उन्हें अपना नहीं सकता भले मान लूं। मुझे लगता है कि गुरु श्री मुझे अपनी विश्वविद्यालय से निष्कासित कर देंगी। परंतु यह भी एक आशीर्वाद ही होगा। 

खैर कल की मुरली प्रमुख रूप से इस बात पर थी कि इस शरीर रूपी रथ पर विराजमान आत्मा रथी है। रथी समझकर कर्म करो तो देह अभिमान छूट जाएगा। किसी भी आकारी या साकारी चित्र को देखते मत रहो। आत्मा को देखो और एक विदेही को याद करो।

अब मैं गुरु श्री को कैसे अपनी समस्या बताऊँ कि जब बाबा स्वयं कह रहे हैं किसी भी चित्र या देहधारी को याद नहीं करना है। फिर भी मै अपने आस पास चित्रों की जमात देखता हूँ। हम देहधारियों की जमात बढ़ाते जा रहे हैं। उन्हें छोड़ ही नहीं रहे हैं। उनकी आत्मा को मुक्त नहीं कर रहे हैं। आत्माये लौटकर आ रही हैं। पुरानी दुनिया का ममत्व नही छूट रहा। तो जब कोई ऐसी आत्माओं पर शंका करता है तो वह कहीं न कहीं ब्रह्मा बाबा के वचनों को भीतर सहेजने के कारण ही ऐसा कर रहा।

मन व्यथित है, चेतना के द्वार पर लटके है ताले;
उत्तरों की खोज में बहता ये मन कैसे संभाले।

सत्य के अभ्यास में बस वेदना सहनी पड़ी;
जग थमाता है सदा सुकरात को जहरों के प्याले।

जब किसी मंतव्य को उसकी कसौटी पर कसो;
तब नजर आयेंगे काले मेघ में डूबे उजाले।

जो समझ के पार हो, वो बात उन पर छोड़ दो;
वो ही करें अब फैसला, तुमको डूबा दे या उबारे।।

बाबा ही पार करेगा।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
28.06.2022

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