आज की मुरली 22.06.2022

आज की ज्ञान चर्चा अधूरी रही। गुरु श्री अपने साकार स्वरूप में मधुबन में उपस्थित नहीं थी। कई बार मन में हुआ कि आज क्या चलें? परंतु गुरु श्री ने अपनी बातों में कई बार कई प्रकार से यह प्रकट किया है के किसी भी शरीरी पर उतनी आस्था नहीं रखनी है जितनी शिवबाबा पर। ज्ञान और ध्यान के मूर्त स्वरूप बाबा ही है। परन्तु मुझे यह लगता है कि साकार के आलम्बन से ही निराकार की प्राप्ति के द्वार खुल सकते है। मेरे जीवन में शुभ परिवर्तन गुरुश्री के ही कारण आये है। इसलिए गुरुश्री साकार स्वरूप में मेरे लिए महत्वपूर्ण है।

आज की मुरली पढ़कर यह समझा कि इस युग में परमात्मा अपने आने वाले कल्प के लिए फाउंडेशन तैयार कर रहे हैं। इसके लिए बाबा को विचारवान, आज्ञाकारी बच्चों की आवश्यकता है।

मुझे यह समझ में आता है की यह एक प्रगतिशील विचार है, जो आज की लौकिक परिस्थितियों में सारवान है। हम अपने जीवन में आसपास, समाज में देखते हैं कि अक्सर बुरे तत्व एक साथ संगठित रूप में रहते हैं। सत्य की राह पर चलने वाले विचार वान लोग अकेले पड़ जाते हैं। यह भी सुना है "संघे शक्ति कलियुगे"। कलियुग में संगठन बड़ी शक्ति है। यह भी सुना है कि अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता। और जो महती विचार लेकर बाबा आगे बढ़ने को कह रहे है, उसके फलीभूत होने के लिए यह आवश्यक है कि हम समझे कि यह बड़ी जिम्मेदारी है। यह तभी पूरी होगी जब सभी सत्य की सोच रखने वाले व्यक्ति संगठित होकर साथ रहे। एक दूसरे से प्रेरित हो आगे बढ़े।

इस संदर्भ में बाबा यह भी चेताते हैं कि यह ध्यान रखना है कि इस यज्ञ में ऐसा कोई व्यक्ति ना आ जाए, जो इसकी बातों से, विचार शक्ति से, उद्देश्यों से, इत्तेफाक ना रखता हो। वह कहते हैं की ऐसे व्यक्ति को लाने वाला भी घनघोर दंड का भागी होगा। मुझे यह बात भी अत्यंत उचित जान पड़ती है। पहली बात तो यह की एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। दूसरी बात यह कि इस यज्ञ का उद्देश्य लोगों को जागृत करना है ना कि convert करना या convince करना।

बाबा यह बताते हैं की पूरी पवित्र इच्छाओं के बावजूद भी माया के ऐसे तूफान आ सकते हैं की हम विकार के वशीभूत हो जाए। ऐसे में बाबा कहते हैं कि अपने विकार को छुपाना नहीं है बल्कि उसे उद्घाटित करना है। बाबा तक पहुंचाना है। 

इस बात को मैं इस तरह समझ पा रहा हूँ कि ऐसा नहीं है की ज्ञान को समझ लेने के बाद मन में विकारी विचार उत्पन्न नहीं होंगे। ऐसे विचार तो आते ही रहेंगे क्योंकि हमारे आसपास का वातावरण अविकारी नहीं है बल्कि दोषपूर्ण है। ज्ञान का उद्देश्य यह है कि हम ऐसे विकारी विचारों को पहचान सके और उनको अपने से दूर करने का प्रयास कर सके। मेरे विचार से ऐसा करना ऐसा करने का सबसे आसान रास्ता वही है जो बाबा कहते है। वो यह कि हम अपने विकार को उद्घाटित कर दे। और बाबा यह कहते हैं कि उद्घाटन उनके सामने करना है। तो हमको यह ध्यान देना है कि किसी ऐसे व्यक्ति से ऐसी बातें ना करें जो उसका अनुचित लाभ ले, हमारे मानसिक स्तर को बिगाड़ दे। बल्कि ऐसे व्यक्ति से कहना है जो पतित पावन भगवान की तरह है सारा विषपान कर ले और अपने गले में धारण कर ले और आपको अमृत छकने के लिए दे दे।

बाबा कहते हैं हमें वह दृष्टि उत्पन्न करनी है जो हर तरफ से अच्छाई को ही देखें। बुराई में भी अच्छाई को ढूंढ ले। गुरु श्री ने समझाया था कि यह करने के लिए जो सबसे अच्छा तरीका है वह यह है की पहले अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांग लेना और दूसरों को उनकी गलतियों पर क्षमा कर देना। मुझे लगता है यही वह तरीका होगा जब हम में यह दृष्टि आ जाएगी कि हम सब में अच्छा ही अच्छा देखने लगेंगे। जब हम सब को अंदर से क्षमा कर देते हैं तो अपने आप उनकी तरफ से मन हट जाता है। कबीर दास ने भी लिखा है बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोई। 
मुझे लगता है कि आज के युग में यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। यदि हम आज के युग में अपने आसपास अपने समाज लोगों पर नजर डालें तो पाएंगे की सद्गुण, सदाचार और सत्य को धारित करने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। और जो है भी वह समाज में बहुत प्रभावशाली स्थिति नहीं रखते हैं। ऐसे में अगर हम बुराई देखने की नजर से चारों तरफ देखेंगे तो पाएंगे कि हर तरफ बुरा ही बुरा है। यह मन के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। नेगेटिविटी हावी हो जाएगी। पर्सनैलिटी डिफेक्टिव हो जाएगी। और ऐसी नकारात्मकता में शांति के, प्रेम के, विश्वास के फूल कैसे खिल सकते हैं!!!!!

!!ओम शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
22.06.2022

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