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लईया लेलो गट्टा लेलो

"लईया लेलो गट्टा लेलो  आठे आना पउवा लेलो" मेले में उठती वो आवाजें अब नहीं आती है। अब कोई सामान अपनेपन के साथ नहीं बेचता-खरीदता। दुकान में दुनियाभर की बात बताने वाले सेल्समैन नहीं मिलते। बिना किसी मकसद से हाल-चाल लेने वाले कम होते जा रहे। अनजाने से राम-राम करने का जमाना ही लद गया है। आठ आने पउवा भर छोड़िए, छटांक भर भी नहीं मिलेगा। मेले से लेकर मॉल और मेट्रो का सफ़र तय हो गया। हर काम में समय बचाने में लगी रही मानव सभ्यता ने ऐसे ऐसे उपकरण ईजाद किए कि हर काम में लगने वाला समय कम से कम हो गया। लेकिन पेड़ की छांव में खाट बिछाकर पत्तों से छनकर आने वाली धूप चेहरे पर लेते हुए सुस्ताने वाले पल लोगो की जिंदगी से खतम हो गए है। भदोही के बरवा बाजार के दशहरे के मेले में अभी भी पुकार आती है "जलेबिया बोलता लड़कवन का मनवा डोलता", लेकिन अब लड़कवन का मन नहीं डोलता है। ------- प्रियदर्शी प्रतीक 04.09.2023