विह्वल विशाल सागर सी आंखे तुम्हारी, सपनीली दुनिया की सैर को आतुर दिखती है। खामोशी की चादर ओढ़े सिले से ये होंठ, जाने कितनी कहानियां कहने को आतुर है। पलकों की सिलवटों के बीच से नज़र आती है, स्वत्व खोज, जीतने की चाहत। होंठो के किनारे, दबाई हुई मुस्कुराहट, खोलना चाहती है संभावनाओं के द्वार। किन्तु ये दुनियां की रवायतें और सामाजिक रीत, न सिर्फ बांधती है मन को बल्कि आत्मा के गीत खुशियों के दरख्त, लद जाये फूलों से, सपनों की उड़ान हो, हर फिक्र से आज़ाद। उससे पहले वो ओढ़ के आती है, रिवाजो का नकाब, और तोड़ती जाती है, उम्मीदों के मकान। कुंठित कर, सपनों की चमक, बोझिल कर, उम्मीदों की मुस्कान। उभरने से पहले, निखरने से पहले बुझ सा जाता है, आत्मा का गान। नकाब को ओढ़ी, भीड़ के साथ पार्श्व में छुप जाती है, स्वत्व की पहचान। परन्तु हे आत्मन, यदि धार के विपरीत होना, मृत्यु का सामिप्य हैं, तो अंतरात्मा से विमुखता, सृजनात्मकता का अंत है सोच कर देखो जरा, जीवंतता की प्राणमूर्ति श्वास का आवागमन ही, जीव की संज्ञा नही है। स्वत्व को पाने का हेतु, जगती में स्व की पहचान निर्विवाद ये मूल तत्व ही, संसार चक...