अमृत और विष: अमृत लाल नागर: एक दृष्टि
साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत अमृत और विष एक ऐसा उपन्यास है जो 1966 में प्रकाशित अवश्य हुआ, लेकिन इसमें उद्धृत पात्र व चरित्र उन्हीं सामाजिक संरचना, समस्याओं और भावनाओं को साझा करते हैं जो आज के समाज में भी प्रासंगिक है। एक अलग विधा में इस उपन्यास का सृजन हुआ है। उपन्यास के कहानी के केंद्र में एक लेखक और उसके द्वारा सृजित उपन्यास है। उपन्यास अंतिम चरण में स्वयं उपन्यासकार स्वयं लेखक के माध्यम से स्वीकार करते है कि इस डायरी और उपन्यास में उनके पड़बाबा व बाबा के जमाने से लेकर उनके अपने जमाने तक की न जाने कितनी परिस्थितियां, कितने चरित्र और चित्र एक बार फिर से जी उठे और वह उसी अनुभव विचार और कल्पना शक्ति से न जाने कितनी परिस्थितियां चरित्र और चित्र गढ़ते गए। एक उपन्यास में इतने पात्रों का सम्मिलन, कथानक को अस्त व्यस्त किये बिना और यथास्थिति हर पात्र के साथ न्याय करना, अद्भुत व दुष्कर कार्य रहा होगा। यही कारण है की यदि कोई मुझसे पूछे की इस उपन्यास का कथानक क्या है तो एक सीधी कथा नहीं रखी जा सकती है। यह अपने तरह का एक अनूठा प्रयोग है जिसमें उपन्यास के भीतर उपन्यासकार एक उपन्यास लिखता एव...