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Showing posts from May, 2026

अधूरे ख़्वाब

कितनी अधूरी चाहत, मन में दबी हुई है मन की गिरह में कितनी गांठें पड़ी हुई है!! चलते हुए डगर में, हम दूर निकल आए राहों में हर एक पग की, छापे पड़ी हुई है!! मिला दोस्तो का साथ वर्षों बरस के बाद जाना के दिल की कोठरी में यादें पड़ी हुई है!!  प्यार की वो ख्वाहिश अधूरी क्यों रह गयी इज़हार की तमन्ना दिल में पड़ी हुई है!! अधूरे ख़्वाब, अधूरी बात, अधूरी कहानियां है मलमल की चादरों पर सिलवट पड़ी हुई है!! ऐ काश ऐसा होता, ऐ काश वैसा होता यही सोचने में उसकी नींदें उड़ी हुई है!! मुड़ कर कभी जो देखा, वो ज़ार ज़ार रोया महफ़िल में उसके होंठ पर चुप्पी पड़ी हुई है!! इतना सुकून ही बस जीने को होगा काफ़ी यादों में उसकी, मेरी यादें जुड़ी हुई है!! ------ प्रियदर्शी प्रतीक  डुमरांव 09.05.2026

अधूरी

कितनी अधूरी चाहतें मन में दबी हुई है मन की गिरह में कितनी गांठें पड़ी हुई है!! अनकही कहानियाँ  अधूरी बातें छोड़े हुए ख़्वाब झांकते है कभी कभी मौका पाकर पाकर कभी उन कहानियों, बातों और ख्वाबों के सिरे जो रह गए कहीं अनकहे, अधूरे और छुटे हुए। क्योंकि उन्हें बुनना था कहना था देखना था तुम्हारे साथ पर तुम पास थे, पर साथ नहीं थे आशा थे, विश्वास नहीं थे। मन के तार तो जुड़ भी जाते हाथों में पर हाथ नहीं थे तो रह गयी मन की गिरह में दबकर वो कहानियाँ, बातें और ख्वाब अधूरे किसी स्याह रात में एकांतिक मुलाक़ात में अपनेपन की बात में याद की बरसात बन बरस पड़ने को और देने को अंतिम टीस  कि बात पर  साथ-आस-विश्वास की हम चुप थे  क्यों चुप थे। क्यों नहीं खुल पायी  सामने आयी  मन की ये गिरहें जो बनाती है मेरे ख्वाब, बाते और  कहानियाँ अधूरी ------- प्रियदर्शी प्रतीक  डुमरांव 09.05.2026

प्रेम के रस बरसें

नव किसलय संकुचे से बाहर दिख स्थिर भीतर में कंपते थे मिलते थे, तकते थे दूर रहकर साथ साथ अजनबी से चलते थे काया में व्याकुल प्राण अंतस में टीस भरे मिलन को तड़पते थे सांसारिकता व्यवहारिकता जीवन की वास्तविकता रहस्यों में उलझे थे भाव रूप छंद द्वंद्व अपनों की अपेक्षा के शर से थे बिद्ध प्राण जीवन से दूर दूर जीवनी के चक्र में जीवन रस चखते थे काल चक्र की गति में कामना के भंवर में डूबकर उतरते थे उसकी आगत से ली अरुणिमा ने अंगड़ाई  चेतन हो जाग पड़े भौतिक संसार में निर्विकार ब्रह्म हेतु "नेती-नेती" बांच पड़े प्रेम की सार्थकता आत्मा का मिलन है युक्ति यह जान पड़े उसका निस्वार्थ प्रेम चाहता समर्पण बस ऐसा विश्वास बढ़े माया का द्वैत रूप आत्मिक गहराई में अद्वैत की नाव चढ़े भक्ति प्रेम रस पागे सरल शुद्ध आत्मन में  परमात्मा रास रचे जग का रहस्य जान व्याकुल प्रियदर्शी प्राण प्रिय के दरस तरसें आत्मा की मुक्ति हेतु कामना "प्रियदर्शी" की प्रियतम के मिलन को आत्मन अब न तरसे प्रेम के रस बरसें- प्रेम के रस बरसें।। --------- प्रियदर्शी प्रतीक  डुमरांव  08.05.2026

यादें कॉलेज की

सरल सुकोमल शुद्ध हृदय की होने लगती बात मेघ घटा घनघोर औ बारिश, ऐसी उनकी याद। सकुचाया सा हृदय, प्रफ्फुलित रहता था यूं गात, अलसायी सी कली जो खोले सुबह सुनहरे पात। दिन का नहीं ठिकाना कोई, बातों बीती रात, कॉलेज की गलियारों में बस मित्रों का साथ। याद करें पर याद न आये पढ़ी लिखी कोई बात, अथक दमकते मुख मंडल की स्मृतियों का ही वास। सुबह शाम की हंसी ठिठोली, एक दूजे की बात याद में है बस बरस पुरानी छोटी सी मुलाक़ात। यौवन का उत्साह ललित औ तन मन में स्फूर्ति, दुनिया के हर खेल से विस्मृत यारो की वो बस्ती। जिनको देखे बिना नहीं होती दिन की शुरुआत  अब सालों साल बीत गए पर हुई नहीं मुलाकात। काल गति से अलग थलग सब, दुनिया नई बसाये, यौवन की कोमल स्मृतियों पर मन से निकले हाय। आह भरे, बेचैन हो उठे फिर बैठ बैठ मुसुकाए  कॉलेज की वो मधुर स्मृतियां, भूले नहीं भुलाए। उन यादों के घेरे,  जब जब "प्रियदर्शी" आते है,  मन मयूर के पंखों पर नित नूतन यौवन लाते है। ------- प्रियदर्शी प्रतीक डुमरांव  07.05. 2026