अधूरी

कितनी अधूरी
चाहतें
मन में दबी हुई है

मन की गिरह में
कितनी
गांठें पड़ी हुई है!!

अनकही कहानियाँ 
अधूरी बातें
छोड़े हुए ख़्वाब
झांकते है
कभी कभी मौका पाकर

पाकर कभी
उन
कहानियों, बातों और ख्वाबों के सिरे
जो रह गए कहीं
अनकहे, अधूरे और छुटे हुए।

क्योंकि
उन्हें
बुनना था
कहना था
देखना था
तुम्हारे साथ

पर
तुम पास थे,
पर साथ नहीं थे
आशा थे, विश्वास नहीं थे।
मन के तार
तो जुड़ भी जाते
हाथों में
पर हाथ नहीं थे

तो
रह गयी
मन की गिरह
में दबकर
वो कहानियाँ, बातें और ख्वाब
अधूरे

किसी स्याह रात में
एकांतिक मुलाक़ात में
अपनेपन की बात में
याद की बरसात बन
बरस पड़ने को

और देने को
अंतिम टीस 
कि
बात पर 
साथ-आस-विश्वास की
हम चुप थे 
क्यों चुप थे।

क्यों
नहीं खुल पायी 
सामने आयी 
मन की ये गिरहें
जो बनाती है
मेरे ख्वाब, बाते
और 
कहानियाँ
अधूरी


-------

प्रियदर्शी प्रतीक 
डुमरांव
09.05.2026




Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru