यादें कॉलेज की

सरल सुकोमल शुद्ध हृदय की होने लगती बात
मेघ घटा घनघोर औ बारिश, ऐसी उनकी याद।

सकुचाया सा हृदय, प्रफ्फुलित रहता था यूं गात,
अलसायी सी कली जो खोले सुबह सुनहरे पात।

दिन का नहीं ठिकाना कोई, बातों बीती रात,
कॉलेज की गलियारों में बस मित्रों का साथ।

याद करें पर याद न आये पढ़ी लिखी कोई बात,
अथक दमकते मुख मंडल की स्मृतियों का ही वास।

सुबह शाम की हंसी ठिठोली, एक दूजे की बात
याद में है बस बरस पुरानी छोटी सी मुलाक़ात।

यौवन का उत्साह ललित औ तन मन में स्फूर्ति,
दुनिया के हर खेल से विस्मृत यारो की वो बस्ती।

जिनको देखे बिना नहीं होती दिन की शुरुआत 
अब सालों साल बीत गए पर हुई नहीं मुलाकात।

काल गति से अलग थलग सब, दुनिया नई बसाये,
यौवन की कोमल स्मृतियों पर मन से निकले हाय।

आह भरे, बेचैन हो उठे फिर बैठ बैठ मुसुकाए 
कॉलेज की वो मधुर स्मृतियां, भूले नहीं भुलाए।

उन यादों के घेरे,  जब जब "प्रियदर्शी" आते है, 
मन मयूर के पंखों पर नित नूतन यौवन लाते है।

-------
प्रियदर्शी प्रतीक
डुमरांव 
07.05. 2026

Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru