प्रेम के रस बरसें

नव किसलय संकुचे से
बाहर दिख स्थिर
भीतर में कंपते थे

मिलते थे, तकते थे
दूर रहकर साथ साथ
अजनबी से चलते थे

काया में व्याकुल प्राण
अंतस में टीस भरे
मिलन को तड़पते थे

सांसारिकता व्यवहारिकता
जीवन की वास्तविकता
रहस्यों में उलझे थे

भाव रूप छंद द्वंद्व
अपनों की अपेक्षा के
शर से थे बिद्ध प्राण

जीवन से दूर दूर
जीवनी के चक्र में
जीवन रस चखते थे

काल चक्र की गति में
कामना के भंवर में
डूबकर उतरते थे

उसकी आगत से
ली अरुणिमा ने अंगड़ाई 
चेतन हो जाग पड़े

भौतिक संसार में
निर्विकार ब्रह्म हेतु
"नेती-नेती" बांच पड़े

प्रेम की सार्थकता
आत्मा का मिलन है
युक्ति यह जान पड़े

उसका निस्वार्थ प्रेम
चाहता समर्पण बस
ऐसा विश्वास बढ़े

माया का द्वैत रूप
आत्मिक गहराई में
अद्वैत की नाव चढ़े

भक्ति प्रेम रस पागे
सरल शुद्ध आत्मन में 
परमात्मा रास रचे

जग का रहस्य जान
व्याकुल प्रियदर्शी प्राण
प्रिय के दरस तरसें

आत्मा की मुक्ति हेतु
कामना "प्रियदर्शी" की
प्रियतम के मिलन को
आत्मन अब न तरसे
प्रेम के रस बरसें- प्रेम के रस बरसें।।

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प्रियदर्शी प्रतीक 
डुमरांव 
08.05.2026

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