एनपीए: एक बैंकर की मोहब्बत
एनपीए आज के युग में सामान्य ज्ञान की किताब में उल्लिखित संक्षेप शब्द "नासा" के सरीखा है, जिसका पूरा नाम एवं वस्तुस्थिति जानने की अपेक्षा हर एक नागरिक से रखी जाती हैं। अतः "एनपीए क्या है" इस बारे में विस्तार से चर्चा सामान्य ज्ञान के प्रति जघन्य अपराध और आम भारतीय नागरिक के सामान्य ज्ञान पर ऊँगली उठाने सरीखा होगा। आज एनपीए का आभामंडल बहुत विस्तृत है। ऐसे मौके पर विजय माल्या सरीखे चितवो के महान योगदान को उद्धृत न करना भी कृतघ्नता कही जाएगी, जिन्होंने एनपीए के महत्व को जन जन तक पहुंचाने में महती योगदान दिया है। एनपीए से लड़ने के बैंकों के तरीकों और एनपीए से बचने के लिये माल्या जी के उपायों ने एनपीए को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवायी है। वैसे हमलोग अभी सिर्फ बैंकर और एनपीए के प्रेम प्रसंग को ही छेड़ेंगे।
अर्थ का महत्व जीवन के हर पहलु में नज़र आता हैं। यहाँ "अर्थ " का प्रयोग उस सन्दर्भ में है जिसपर नियंत्रण होने के कारण देवी लक्ष्मी हर व्यक्ति के पूजा घर में स्थान बनाने में सफल रही हैं। राजनीतिक गलियारों में यह बात चलन में रही है कि जिसने पर्स पर काबू कर लिया उसने सरकार को कब्जे में कर लिया। इसी कारण वित्त मंत्रालय सभी मंत्रालयों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आजकल अख़बार के पन्ने उलटते ही जो खबरें किसी बैंकर का जी जलाती हैं, वो एनपीए के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक की मीनारों से गूंजते एलान यथा एनपीए कम करो नहीं तो बैंक किसी और बैंक में समाहित हो जायेगा, एनपीए कम करो नहीं तो सरकार पूँजी निकाल लेगी और मांगने पर देगी नहीं, एनपीए कम करो नहीं तो सैलरी बढ़ने की जगह घट सकती हैं, एनपीए कम करो नहीं तो ये, नहीं तो वो, कई पन्ने कम पड़ेंगे ये बताने में कि एनपीए कम नहीं हुआ तो क्या क्या हो सकता हैं बैंक और बैंकर के साथ।
एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि जो स्थान सामाजिक गलियारे में प्रेम की है वैसी ही जगह आर्थिक गलियारे में एनपीए की है। प्रेम के दुश्मन घर घर में कोने कोने में बैठे है। कोई धर्म की लठ्ठ लेकर, कोई जाति की, कोई परिवार की, कोई संस्कृति की लाठी लेकर समाज को हांकने बैठा है और ताक लगाये है कि कही किसी कोने में प्रेम घटित न हो जाये। लेकिन "प्यार तो होना ही था" की तर्ज पर प्रेम हो ही जाता है। प्रेम होने के बाद भी लठ्ठ लिए प्रेम के पीछे दौड़ते रहते है लेकिन कम होने को कौन कहे, "जब जब प्यार पर पहरा हुआ है, प्यार और भी गहरा हुआ है" की तर्ज पर प्रेम गहराता जाता है।
ठीक ऐसी ही हालत एनपीए की हो रखी हैं। शाखा से लेकर प्रधान कार्यालय तक पुरजोर कोशिश के साथ दिन रात एक किये हुए लगा रहता है। शाखा प्रबंधक, मंडल कार्यालय और प्रधान कार्यालय के अनेक अधिकारी और कर्मचारी; विविध प्रकार के विभाग यथा आस्ति वसूली, विधि, योजना, क्रेडिट मॉनिटरिंग अपने अपने स्तर पर साम, दाम, दंड, भेद की नीतियों के साथ सॉसक्ल, रिकवरी वाद पत्र, कानूनी नोटिस, ऋण वसूली अधिकरण में मुकदमे रूपी लठ्ठ लिए एनपीए रोकने के लिए तैनात रहते है। फिर भी "प्यार किया नही जाता, हो जाता है" की तर्ज पर एनपीए हो ही जाता है। एनपीए होने के बाद उसे छिपाने, दबाने, मिटाने की पुरजोर कोशिश भी की जाती है लेकिन "हम लाख छुपाये प्यार मगर दुनिया को पता चल जायेगा" की तर्ज पर एनपीए दुनिया के सामने जाहिर हो ही जाता हैं। इसके बाद एनपीए के दमन की जो कहानी प्रारम्भ होती है उसे कहने के लिए महर्षि वेद व्यास सरीखा विद्वान और भगवान श्री गणेश जैसा लेखक चाहिए। ये दमन वैसा दमन तो नहीं होता जैसा ब्रिटिश ने १८५७ की क्रांति का किया या कि जैसा चीन ने थियानमेन स्कवायर पर क्रांतिकारी छात्रों का किया। परन्तु एनपीए की संकल्पना मूर्त रूप में आने के बाद बैंकर ने उन क्रांतिकारियों जितना पसीना अवश्य ही बहाया है और उसी अनुपात में अपना खून भी जलाया हैं।
इस लड़ाई में कही न कही, बैंकर एनपीए को अपना शत्रु समझने लगा है। हाँ इसे मित्र की तरह भी नहीं देखा जा सकता, पर यदि दूसरे नजरिये से गौर फ़रमाया जाए तो एनपीए बैंकिग व्यवसाय की आनुषंगिक ऊपज, गौण-उत्पाद हैं। इसकी सच्चाई को नकारना ऐसा ही है जैसे समाज में पैदा होने वाले प्रेम को नकारना। एनपीए को माता-पिता की बिगड़ैल संतान भी समझा जा सकता हैं। इस एनपीए रूपी संतान के माता पिता, बैंकर और व्यवसायी कहे जा सकते हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि ये कतई जरुरी नहीं है कि संतान के बिगड़ने का दोष सिर्फ माता-पिता का होता हैं। बिगड़ने के पीछे समाज, वातावरण और प्रारब्ध जैसे कई कारक हो सकते हैं। फिर आज की परिवर्तन शील अर्थव्यवस्था में एनपीए को बाहरी शत्रु की तरह देखना भी कतई उचित नहीं हैं। आज की अर्थव्यवस्था जो अर्थशास्त्र का विशद ज्ञान रखने वाले अर्थशास्त्रियों को भी अचम्भे में डाल देती हैं। वर्तमान समय की अर्थव्यवस्था को भगवन राम और सीता माता के जन्म कुंडली समझे और अर्थशास्त्रियों को महात्मा वशिष्ठ समझे तो कोई गलती नहीं होगी। महात्मा वशिष्ठ जैसे ज्ञानी ने कुंडली विचारकर, भगवान राम और सीताजी के विवाह को शुभ फल दायक कहा। लेकिन यदि सांसारिक दृष्टि से देंखे तो उस विवाह के बंधन में पड़कर सीता माता को अपार कष्ट सहने पडे। इसीतरह जब महान अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था की चाल देखकर गच्चा खा जा रहे हो और बहुत विचार करने पर भी सटीक आकलन करने से चूक जा रहे हो, तो ऐसे में एनपीए को बैंकर और व्यवसायी की जानबूझकर की गयी गलती मानकर उनके साथ उस तरह से व्यवहार करना जैसे खाप पंचायत प्रेमी जोड़ो के साथ करती है, किसी भांति उचित नहीं हैं।
सोचना तो पड़ेगा क्योंकि इस अर्थवयवस्था में "कुछ-कुछ होता है" जिसे न तो "राहुल"(बैंकर) समझ पाता हैं न तो "अंजलि" (व्यवसायी) समझती है और न ही "टीना"(सरकार) समझ पाती हैं। और "ना जाने मेरे दिल को क्या हो गया" की तर्ज पर एनपीए हो ही जाता हैं। वक्त की माँग है कि राहुल, टीना और अंजलि एक दूसरे के दिल की बात और मजबूरियों को जाने और समझे।
लगता है सरकार ने इस बात को थोड़ा समझा हैं। ऐसा इसलिए कह सकते है क्योकि दिवालिया और समाधान से सम्बंधित नए कानून इस तरफ इशारा करते है कि सरकार की मंशा हैं कि बिगड़ैल बच्चे को भी सुधरने का अवसर दिया जाना चाहिए। तो ऐसे वक्त में सभी सोचना पड़ेगा कि एनपीए की तरफ लठ्ठ लेकर दौड़ने की और उसके माता-पिता (बैंकर-व्यवसायी) को खाप पंचायत सरीखी सज़ा देने की जरुरत है या उसे हाथ से सहारा देने की और उसे समाज में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता हैं।
अर्थ का महत्व जीवन के हर पहलु में नज़र आता हैं। यहाँ "अर्थ " का प्रयोग उस सन्दर्भ में है जिसपर नियंत्रण होने के कारण देवी लक्ष्मी हर व्यक्ति के पूजा घर में स्थान बनाने में सफल रही हैं। राजनीतिक गलियारों में यह बात चलन में रही है कि जिसने पर्स पर काबू कर लिया उसने सरकार को कब्जे में कर लिया। इसी कारण वित्त मंत्रालय सभी मंत्रालयों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आजकल अख़बार के पन्ने उलटते ही जो खबरें किसी बैंकर का जी जलाती हैं, वो एनपीए के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक की मीनारों से गूंजते एलान यथा एनपीए कम करो नहीं तो बैंक किसी और बैंक में समाहित हो जायेगा, एनपीए कम करो नहीं तो सरकार पूँजी निकाल लेगी और मांगने पर देगी नहीं, एनपीए कम करो नहीं तो सैलरी बढ़ने की जगह घट सकती हैं, एनपीए कम करो नहीं तो ये, नहीं तो वो, कई पन्ने कम पड़ेंगे ये बताने में कि एनपीए कम नहीं हुआ तो क्या क्या हो सकता हैं बैंक और बैंकर के साथ।
एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि जो स्थान सामाजिक गलियारे में प्रेम की है वैसी ही जगह आर्थिक गलियारे में एनपीए की है। प्रेम के दुश्मन घर घर में कोने कोने में बैठे है। कोई धर्म की लठ्ठ लेकर, कोई जाति की, कोई परिवार की, कोई संस्कृति की लाठी लेकर समाज को हांकने बैठा है और ताक लगाये है कि कही किसी कोने में प्रेम घटित न हो जाये। लेकिन "प्यार तो होना ही था" की तर्ज पर प्रेम हो ही जाता है। प्रेम होने के बाद भी लठ्ठ लिए प्रेम के पीछे दौड़ते रहते है लेकिन कम होने को कौन कहे, "जब जब प्यार पर पहरा हुआ है, प्यार और भी गहरा हुआ है" की तर्ज पर प्रेम गहराता जाता है।
ठीक ऐसी ही हालत एनपीए की हो रखी हैं। शाखा से लेकर प्रधान कार्यालय तक पुरजोर कोशिश के साथ दिन रात एक किये हुए लगा रहता है। शाखा प्रबंधक, मंडल कार्यालय और प्रधान कार्यालय के अनेक अधिकारी और कर्मचारी; विविध प्रकार के विभाग यथा आस्ति वसूली, विधि, योजना, क्रेडिट मॉनिटरिंग अपने अपने स्तर पर साम, दाम, दंड, भेद की नीतियों के साथ सॉसक्ल, रिकवरी वाद पत्र, कानूनी नोटिस, ऋण वसूली अधिकरण में मुकदमे रूपी लठ्ठ लिए एनपीए रोकने के लिए तैनात रहते है। फिर भी "प्यार किया नही जाता, हो जाता है" की तर्ज पर एनपीए हो ही जाता है। एनपीए होने के बाद उसे छिपाने, दबाने, मिटाने की पुरजोर कोशिश भी की जाती है लेकिन "हम लाख छुपाये प्यार मगर दुनिया को पता चल जायेगा" की तर्ज पर एनपीए दुनिया के सामने जाहिर हो ही जाता हैं। इसके बाद एनपीए के दमन की जो कहानी प्रारम्भ होती है उसे कहने के लिए महर्षि वेद व्यास सरीखा विद्वान और भगवान श्री गणेश जैसा लेखक चाहिए। ये दमन वैसा दमन तो नहीं होता जैसा ब्रिटिश ने १८५७ की क्रांति का किया या कि जैसा चीन ने थियानमेन स्कवायर पर क्रांतिकारी छात्रों का किया। परन्तु एनपीए की संकल्पना मूर्त रूप में आने के बाद बैंकर ने उन क्रांतिकारियों जितना पसीना अवश्य ही बहाया है और उसी अनुपात में अपना खून भी जलाया हैं।
इस लड़ाई में कही न कही, बैंकर एनपीए को अपना शत्रु समझने लगा है। हाँ इसे मित्र की तरह भी नहीं देखा जा सकता, पर यदि दूसरे नजरिये से गौर फ़रमाया जाए तो एनपीए बैंकिग व्यवसाय की आनुषंगिक ऊपज, गौण-उत्पाद हैं। इसकी सच्चाई को नकारना ऐसा ही है जैसे समाज में पैदा होने वाले प्रेम को नकारना। एनपीए को माता-पिता की बिगड़ैल संतान भी समझा जा सकता हैं। इस एनपीए रूपी संतान के माता पिता, बैंकर और व्यवसायी कहे जा सकते हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि ये कतई जरुरी नहीं है कि संतान के बिगड़ने का दोष सिर्फ माता-पिता का होता हैं। बिगड़ने के पीछे समाज, वातावरण और प्रारब्ध जैसे कई कारक हो सकते हैं। फिर आज की परिवर्तन शील अर्थव्यवस्था में एनपीए को बाहरी शत्रु की तरह देखना भी कतई उचित नहीं हैं। आज की अर्थव्यवस्था जो अर्थशास्त्र का विशद ज्ञान रखने वाले अर्थशास्त्रियों को भी अचम्भे में डाल देती हैं। वर्तमान समय की अर्थव्यवस्था को भगवन राम और सीता माता के जन्म कुंडली समझे और अर्थशास्त्रियों को महात्मा वशिष्ठ समझे तो कोई गलती नहीं होगी। महात्मा वशिष्ठ जैसे ज्ञानी ने कुंडली विचारकर, भगवान राम और सीताजी के विवाह को शुभ फल दायक कहा। लेकिन यदि सांसारिक दृष्टि से देंखे तो उस विवाह के बंधन में पड़कर सीता माता को अपार कष्ट सहने पडे। इसीतरह जब महान अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था की चाल देखकर गच्चा खा जा रहे हो और बहुत विचार करने पर भी सटीक आकलन करने से चूक जा रहे हो, तो ऐसे में एनपीए को बैंकर और व्यवसायी की जानबूझकर की गयी गलती मानकर उनके साथ उस तरह से व्यवहार करना जैसे खाप पंचायत प्रेमी जोड़ो के साथ करती है, किसी भांति उचित नहीं हैं।
सोचना तो पड़ेगा क्योंकि इस अर्थवयवस्था में "कुछ-कुछ होता है" जिसे न तो "राहुल"(बैंकर) समझ पाता हैं न तो "अंजलि" (व्यवसायी) समझती है और न ही "टीना"(सरकार) समझ पाती हैं। और "ना जाने मेरे दिल को क्या हो गया" की तर्ज पर एनपीए हो ही जाता हैं। वक्त की माँग है कि राहुल, टीना और अंजलि एक दूसरे के दिल की बात और मजबूरियों को जाने और समझे।
लगता है सरकार ने इस बात को थोड़ा समझा हैं। ऐसा इसलिए कह सकते है क्योकि दिवालिया और समाधान से सम्बंधित नए कानून इस तरफ इशारा करते है कि सरकार की मंशा हैं कि बिगड़ैल बच्चे को भी सुधरने का अवसर दिया जाना चाहिए। तो ऐसे वक्त में सभी सोचना पड़ेगा कि एनपीए की तरफ लठ्ठ लेकर दौड़ने की और उसके माता-पिता (बैंकर-व्यवसायी) को खाप पंचायत सरीखी सज़ा देने की जरुरत है या उसे हाथ से सहारा देने की और उसे समाज में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता हैं।
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