परमात्मा की कृपा और आध्यात्मिक उन्नति

आज की मुरली
 13.06.2022 
 
आज दो तीन दिनों के भटकाव के बाद आज मैं मुरली में सम्मिलित हुआ। यहाँ आकर यह महसूस हुआ की जैसे कुछ दिनों से कुछ छूटा हुआ सा था, कुछ कम था।

आज जो ज्ञान गुरूश्री ने दिया उसको मैं इस प्रकार समझ पाया हूँ। जीवन एक पाठशाला है जिसमें हर व्यक्ति का यह उत्तरदायित्व है कि वो अच्छी और ज्ञान की बातों को सीखने का प्रयास करें और उन्हें दूसरों तक भी पहुँचाये। यहाँ संसार में हर व्यक्ति अपनी भूमिका में है। संसार के रंगमंच पर हर कोई अपना उत्तरदायित्व लेकर आया है और अपनी भूमिका निभा कर जाएगा। तो किसी के जाने का कोई शोक भी करना। न ही अपने जीवन से और न ही संसार से।

मनुष्य जीवन का ध्येय नर से नारायण बनने का प्रयास करने का है। इस दिशा में बढ़ना वैष्णव होना हैं।वैष्णव होने से सिर्फ़ यह मतलब नहीं हैं कि बाहरी आचार विचार में परिवर्तन लाना बल्कि ये उस पवित्रता को प्राप्त करने का प्रयास होना चाहिए जब आपके मन में भी कोई बुरा संकल्प न आने पाये। आप सबका अच्छा सोचे और क्षमा को जीवन में धारण करें।

परमात्मा की कृपा की छाया को महसूस करें और उसकी प्राप्ति के निमित्त अपने आपक़ो तैयार करें।परमात्मा आपका ध्यान रखता है और आपके निमित्त परिस्थितियां अनुकूल करता हैं। इस बात को मैं यदा कदा जीवन में महसूस करता रहा हूँ। परंतु मैंने ईश्वर को कभी उसके लिए धन्यवाद नहीं दिया। गजेंद्र मोक्ष की कथा ध्यान में आती है। उसके एक हाथी जल पीने के लिए सरोवर में उतरता है और घड़ियाल उसका पैर पकड़ के खिचने लगता हैं। गज भगवान नारायण को याद करता है और वो उसकी रक्षा को आते है। मैं पिछले कुछ महीनों से अपने सहकर्मियों के बात, व्यवहार और आचरण से दुःखी था। सोचता था कि कैसे इस जगह नौकरी चलेगी। उनके कारण अपार कष्ट था। परिस्थितियों वश कुछ अभिन्न मित्र भी  विरोधी बन गए थे। मुझे लग रहा था कि मैं अकेला पड़ गया हूँ। लेकिन ईश्वर, परमात्मा मेरी चिंता कर रहा था। उसने मुझे अपने कार्यालय में ही ऐसा पद दिलवाया जो उन सहकर्मियों के प्रभाव से दूर था। और सामान्य परिस्थितियों में वह पद मुझे मिलना असम्भव था। तो परमात्मा के ऊपर अपना जीवन छोड़ देने से वो आपकी रक्षा करने अवश्य आता है। दूसरी तरफ़ मैं अपने कुछ अभिन्न मित्रों से परिस्थितियों वश दूर हो गया था। एक अलग तरह का दुराव और मानसिक क्लेश मुझे परेशान कर रहा था। ऐसे में गुरुजी से मुलाक़ात हुई, शिव बाबा ने अपनी शरण में लिया।

गुरुश्री कहती है कि मनुष्य को यह चाहिए कि वो रावण अर्थात् पाँच विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार) को अपने से दूर करे और उसकी क़ैद में न आये। कितना भी ज्ञानी व्यक्ति क्यू न हो। यदि वह अपने आपको इन पाँच विकारों से नहीं बचा पाता हैं तो वह संसार में अधोगति को ही प्राप्त होता हैं। विकारों की समाप्ति की दिशा में कार्य करने भर से आप सांसारिक दुश्चक्र से बहुत तरह से बच जाओगे। पवित्रता की दिशा में प्रयास निरंतर होना चाहिए। मन की पवित्रता के लिए प्रयास बाहरी स्तर से प्रारंभ होता हैं। स्पर्श तक में पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।

आत्मा के तीन सहयोगी हैं। मन, बुद्धि और संस्कार। तीनों का नियमन व शोधन करते हुए आत्मा की पवित्रता बनाये रखी जा सकती हैं। यही प्रक्रिया मनुष्य को विकारों से भी बचाती है।

अंत में, गुरुश्री का कथन है कि मन की उलझनों को त्याग कर परमात्मा पर पूर्ण विश्वास रखकर आगे बढ़कर ही लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक

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