आज की मुरली 26.06.2022

आज की ज्ञान वार्ता में मूल बिंदु था " तपस्या का प्रत्यक्ष फल- खुशी"।

गुरु श्री ने समझाया कि तपस्या तब से प्रारंभ हो जाती है जब हम यह समझ जाते हैं कि हमारा स्वरूप क्या है और हमारा परमात्मा से क्या संबंध है। एक बार उस स्वरूप को समझ लेने के बाद, उस स्वरूप में रहने के लिए हमें जो यत्न करने पड़ते हैं वही तपस्या है।

ब्रह्मा बाबा कहते हैं कि हमारा यह भाग्य है कि हमे यह जानने का अवसर मिला है। इस भाग्य के साथ स्वराज्य मिला है। भविष्य विश्व का राज्य स्वराज्य का जी आधार है। गुरुश्री समझाती हैं कि स्वराज्य मिलने का अर्थ अपने मन पर, इंद्रियों पर, राज्य मिलने से लगाना है। यह स्वराज ही विश्व पर राज्य करने का प्रथम चरण है।

आगे गुरुश्री कहती है कि ज्ञान प्राप्ति का मुख्य आयाम यह समझना है कि हम परमात्मा के बच्चे है। उसे पिता समझकर उसी अनुरुप बात व्यवहार को समझना है जैसे की पिता -पुत्र के संबंध में हम समझते आये है। यह मानसिकता छोड़नी है कि हम परमात्मा के गुलाम हैं। और उसी अनुरूप परमात्मा से अपने संबंध को समझना, सुधारना है। यह बात पिछली मुरली की इस बात से संपुष्ट होती है कि कर्म मनुष्य के हाथ में होते हैं। हम कोई गुलाम नहीं है जिसस कोई काम करवाया जा रहा है। हम परमात्मा के बच्चे हैं। जिस प्रकार पिता बच्चे के हर कार्य पर नजर बनाए रखते हैं। परंतु ऐसा नहीं होता कि हर काम को कैसे करना है, क्या करना है, इसको बार-बार बच्चे को ऑर्डर देकर बताते रहें। इस बात को समझने से कर्म फल के सिद्धांत और हमारे कर्तव्य के प्रति निश्चयात्मक बुद्धि पैदा होती है।

इस बात को भी समझना है कि सिर्फ यही ज्ञान हो जाने से आपका कार्य संपूर्ण नहीं हो जाता। जैसे हम यदि धन कमाते हैं तो हमें यह ध्यान में रखना होता है कि हमारे कमाए गए पूरे धन पर हमारा अधिकार नहीं है। उसका कुछ भाग दान पुण्य में भी लगना चाहिए। उसी प्रकार इस कमाए गए ज्ञान को हम सिर्फ अपने तक नहीं रख सकते। हमें इस ज्ञान को लोगों तक पहुंचाना होगा। क्योंकि यह कार्य इस शरीर के माध्यम से ही पूरा हो सकता है और शरीर की अपनी आयु है। अतः हमारा यह कर्तव्य भी बनता है कि हम ज्ञान को तीव्र गति से अपने आप में समाहित करें जिससे हम बाकी बचे समय में ज्ञान का विस्तार कर सकें।

गुरुश्री कहती हैं की यह भी एक बड़ी जिम्मेदारी है। कहीं कोई यह न कह सके कि हम तक यह बात पहुंचायी ही नहीं गई अन्यथा हम पूरी तरीके से इसमें अपने आप को समर्पित कर सकते थे। यह जिम्मेदारी इसलिए भी बड़ी है क्योंकि माला तभी बनती है उसमें एक एक करके मनके जुड़ते जाते हैं। अगर एक ही मनका रहे तो वह माला कभी नहीं बन पाएगी। तो जग को, संसार को सुंदर बनाना है तो यह प्रयास करते रहना होगा कि अच्छी बात, अच्छी रीति और ज्ञान का प्रसार प्रचार होता रहे।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
26.06.2022

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