आज की मुरली 18.06.2022

आज की चर्चा  में गुरुश्री को आज की मुरली से जो सत्व संग्रहित हुआ उसके बारे में बताया। ब्रम्हा बाबा कहते है कि स्वयं को ट्रस्टी समझकर आचरण करो। देहाभिमानी न बनो, आत्मभिमानी बनो। परमात्मा की याद से अपने विकर्मों को समाप्त करो। काम महाशत्रु हैं। पवित्रता ही वह साधन है जिससे मन सदैव आनन्द की अवस्था में रह सकता है। अंदर और बाहर से एक हो जाता है। वृत्ति, दृष्टि, बोल व चलन सत्य आधारित हो जाते है।

गुरुश्री आत्मभिमानी बनने से तात्पर्य आत्मा की चेतना होना, से लगाती है। इस बात की चेतना होने भर से कि मैं एक सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ, व्यक्तित्व में निर्मलता आ जाती है। आत्मा की चेतना होने से ही ट्रस्टीशिप का आविर्भाव हो जाता है। यह समझ लेना कि इस देह और इस देह से जुड़े हुए संबंध मेरे नही है। मेरा एकमात्र वास्तविक सम्बन्ध परमात्मा से है। इस जगत में आकर मुझे अपना पार्ट अदा करना है। और यह प्रयास करना है कि यह पार्ट अच्छे से अदा हो।
मैं यह सोचता हूँ कि यह सही बात है। हम किसी कार्य को करते समय जब अपनी व्यक्तिगत भावना उस कार्य से अलग रखते है तो हम कर्त्तव्य निर्वहन अच्छे से कर सकते है। न्यायालय के कार्य मे यह बात बहुत साफ तरीके से देखी व महसूस की जा सकती है। ट्रस्टीशिप का भाव लाने से सबसे अच्छी बात यह होगी कि कार्य के प्रतिफल की कोई आशा नहीं रह जाती। इसे ही शायद सूक्ष्म अर्थों में लोभ समाप्त होना कहेंगे।

गुरुश्री समझाती हैं कि पवित्रता को धारित करने से व्यक्ति अंदर और बाहर से एक हो जाता है। पवित्रता का अर्थ है पांचों विकारों से मुक्ति। जब ऐसा हो जाता है तो कोई भी आत्मा आपको अपने से अलग या गलत नही दिखती। सब कुछ अंदर से अच्छा लगने लगता है। उदाहरण के तौर पर गुरुश्री बताती ही कि ऐसा होने पर तो ऐसी स्थिति नही आती कि आप केवल बाहर से किसी की प्रशंसा कर रहे है। क्योंकि आप अंदर से कुछ बुरा देखते ही नहीं होते। अंदर, बाहर एक हो जाता है।

पवित्रता की खाद पड़ने पर ही आत्मा के पौधे पर शांति के फूल खिलते है।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
18.06.2022

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