परमात्मा से संबंध और मन का सुंदरीकरण

आज की मुरली
09.06.2022

जिस प्रकार से हम अपने स्वजनों से, रिश्तेदारों से संपर्क में रहते हैं; मित्रों के संपर्क में रहते हैं उसी प्रकार से परमात्मा के संपर्क में रहना नहीं हो पाता है। यही कारण है कि जब हम अपने प्यारे परमात्मा को ध्यान में लाना चाहते हैं तो हम तत्कालिक रूप से नहीं ला पाते है। हमें आवश्यकता पड़ती है कुछ छवियों की, कुछ निरूपणों की, कुछ कर्मकांडो की, कुछ प्रकियाओं की। इतना सब करने के बाद भी हमें यह अनुभव होता है की हम वास्तव में उन छवियों, निरूपणों, कर्मकांडों और प्रक्रियाओं में ही उलझ कर रह गए। हम परमात्मा से कनेक्ट नहीं कर पाए। इसका कारण यह है कि हमने परमात्मा के स्थान को, परमात्मा के स्वरूप को समझने की जगह; उन बातों पर ज्यादा ध्यान दे दिया जो सिर्फ प्रक्रियागत थी, जो परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करने, परमात्मा से कनेक्ट करने का आयाम भर ही थी। हमने उन्हीं को जरूरत से ज्यादा महत्व देना प्रारंभ कर दिया। हम मूल बिंदु से दूर हटते चले गए। इस कारण होता यह है कि हम बिना सोचे समझे प्रक्रियाओं को पूरा करते चले जाते हैं। परन्तु अंदर अंदर मन के गहरे स्तर पर अ-धार्मिक रंग में रंगते चले जाते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम परमात्मा से इतने दूर हो गए कि चाहने पर भी हम उससे बात नहीं कर पाते, उस तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा पाते, उसके स्वरूप को समझ नहीं पाते, उसकी कृपा के सागर में गोते नहीं लगा पाते। किनारे पर खड़े खड़े प्रक्रियाओं में उलझे सोचते रह जाते हैं।

गुरुश्री, सिखलाती हैं कि जिस प्रकार कांटो को, जंगल-झाड़ियों को बसाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह अपने आप बस जाते है। बगीचे को बसाने की आवश्यकता पड़ती है। हमें मेहनत करनी पड़ती है, एक सुंदर बगीचा बनाने के लिए। उसके लिए हमें माली बनकर झाड़-खंजाड़, गंदगी को हटाना पड़ता है; टेढ़ी-मेढ़ी टहनियों की काट छांट करनी पड़ती है। निरंतर खाद पानी समय-समय पर देना पड़ता है। तब कहीं जाकर एक सुंदर बगीचा तैयार होता है। हमारा मन भी इसी प्रकार का है। यदि हम अपने मन की तरफ देखना बंद कर देते हैं तो हम पाते हैं कि कुछ समय के उपरांत मन में कलुषित विचारों का, बेवजह की बातों का, निराशा का, अन-आस्थाओं का बड़ा ढेर सा बन गया है। मन एक जंगल-झाड़ी के समान बेतरतीब सा हो गया है। ऐसे में जरूरत होती है कि हम समय-समय पर, अच्छे विचारों और सत्संग का खाद-पानी मन को देते रहें।

गुरुश्री, यह भी सिखलाती है की यह कार्य एक झटके का या अचानक से एक-दो दिन का नहीं है। इस कार्य के लिए संयम के साथ, धीरे धीरे लगातार लगे रहना होगा। तब कहीं मन के उपवन में परमात्मा की कृपा के फूल खिलेंगे। 

!!ओम शांति!!

प्रियदर्शी प्रतीक
09.06.2022

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