IIT बाबा: शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूं
बीते दिनों से एक गीत काफी लोकप्रिय हुआ है जिसके बोल है "शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूं।" इसे जैसे गाया गया, मुझे उसका भाव आता है वह बहुत ही अच्छा था और बहुत लोगों को पसंद आया ।
इस गीत को मैंने भी कई बार गुनगुनाया और कई बार अपने फोटो के साथ इसका बैकग्राउंड म्यूजिक लगाया भी। लेकिन मैं समझ नहीं सका था। इसके मायने क्या है शून्य हो रहा हूं मतलब क्या हो रहा है क्यों शून्य हो रहा हूं???
हमें बचपन से जब स्कूल कॉलेज में पढ़ते हैं तो पढ़ाई के दौरान टीचर कहते हैं जो बच्चा ठीक से पढ़ाई नहीं करता कि तुम्हारे शून्य आएंगे, तुम जीरो हो। और जीरो को, शून्य को बड़े ही बेअदबी के साथ देखा जाता है, अपमानजनक अवस्था को दिखाता था जीरो या शून्य ।
फिर इसको क्यों लोग इतना पसंद कर रहे हैं क्यों यह कहते हैं कि मैं शून्य हो रहा हूँ, शिव समा रहे मुझ में और मैं शून्य हो रहा हूँ।
ओशो की बुद्ध की देशना पर एक सीरीज किताबों की है जिसमें से आठवां भाग है अतृप्ति क्यों? इसमें एक जगह शून्य की बात करते हुए, निर्वाण और मोक्ष के अंतर को समझाते हुए ओशो कहते हैं कि "शून्य एक संख्यातीत चीज है।, शून्य मात्र संख्या के बाहर है। शून्य एक है कि दो या तीन या चार या पांच शून्य तो सिर्फ शून्य। यह एक है ना दो ना कर ना पांच। इसीलिए शून्य के जो अर्थ लगाते हो लग जाते हैं। एक पर रख दो शून्य तो वह 9 के बराबर हो जाता है। दो पर रख दो शून्य तो वह 18 के बराबर हो जाता है।"
इसका अर्थ हुआ कि जब हम 20 लिखते हैं तो दो और साथ में शून्य लगाते हैं। इसमें दो की क्या कीमत है? वह तो निश्चित है यहां पर शून्य 18 के बराबर हुआ। वहीं पर यदि एक के साथ शून्य हमने लगाया तो एक की कीमत निश्चित है वहां शून्य नौ के बराबर ।
तो इसके मायने क्या हुए कि जब शिव समा रहे हैं मुझमें, जब मुझमें शिव की समझ पैदा हो रही है, शिव मेरे मस्तिष्क में आ रहे, मन में उतर रहे तो मेरी कीमत संख्यातीत हो गयी। मैं अब सबका हुआ, सब मेरे हुए। मैं स्वयं में दुनिया की नज़रों में भले कुछ भी न रहा लेकिन मैं सब हो गया। किसी से भी जुड़ सकता हूँ और जुड़कर उसकी कीमत बढ़ा सकता हूँ ।
महाकुंभ के दौरान एक बाबा बहुत प्रसिद्ध हुए जिन्हें मीडिया ने आईआईटी बाबा का नाम दिया। लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी जिस बात को लेकर थी वह बात यह थी कि वह IIT से पढ़े हैं, उन्होंने एयरोस्पेस में इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की हुई है। उन्होंने बहुत बड़े अच्छी कंपनी में काम किया। अच्छे पद पर रहे और अच्छे पैसे कमा रहे थे लेकिन वह सब छोड़कर अध्यात्म में आ गये, साधना के मार्ग को चुन लिया। यह लोगों को समझ में नहीं आ रहा। कह सकते हैं कि कुछ लोगों की नजरों में वो शून्य की तरह दिखने लगे।
लेकिन मुझे लगता है कि ये गीत उन पर मुफ़ीद बैठता है। "शिव समा रहे मुझमें और मैं शून्य हो रहा हूँ। शिव को अपनाकर वो उस अवस्था में जा रहे जो सामान्य लोगों के लिए शून्य होना है और साधको के लिए संख्यातीत होना।
हर हर महादेव
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प्रियदर्शी प्रतीक
25.02.2025
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