माघ पूर्णिमा महाकुंभ स्नान डायरी

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माघ का सूर्य अस्त होने को था, अरैल के घाट से मद्धम गति से यमुना जी के जल में गोते लगाते हुए नाव पवित्र संगम की ओर बढ़ रही थी। अपने चारों और मैं देख पता था कि एक दूसरे से बिल्कुल अनजान व्यक्तियों का समूह अपने-अपने समूह में रहते हुए, एक बड़े समूह का निर्माण कर रहा था जिसमें सबके अंदर,बहुत हद तक, एक समान भाव, धार्मिक चैतन्यता और उत्साह था। पानी पर तैरते हुए कृत्रिम घाट के पास सैकड़ो नाव लगी हुई थी जिनमें कुछ नाव से निकल कर घाट पर पहुंच के स्नान की तैयारी में लगे थे तो कुछ लोग वापस आ जा रहे थे नदी के बीच नावों का आपस में टकराना और एक दूसरे के बीच रास्ता बना देना, इन सभी प्रक्रियाओं के बीच में हर व्यक्ति का मन धार्मिक आस्था से लबरेज हो पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए तैयार हो रहा था।

घाट से नीचे पैर रखते ही मखमली बालू की तलहटी का स्पर्श होता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था है या कृत्रिम तौर पर प्रशासन द्वारा किए गए प्रबंध कि इस विराट संगम स्थली पर घुटने भर जल का प्रवाह देखने को मिलता है, जिसमें निर्भय हो सशरीर प्रवेश कर पवित्र स्नान किया जा सकता है। सांवली सलोनी यमुना के जल में खड़े हुए हमें यह समझ में आता है कि सामने की ओर से गंगा जी का तेज धवल प्रवाह गुजर रहा है और नदियों का संगम हो रहा है।

एक बड़े समूह का हिस्सा होते हुए भी हर व्यक्ति अपने छोटे-छोटे समूह की सदस्यता को अभी तक कायम रखें और अपने-अपने समूह में अपने-अपने गति के अनुसार स्नान कर रहा है। जल प्रवाह में, बालू के मखमली तल पर लेट जाना और उस प्रवाह में प्रवाहित होते हुए एक छोर से दूसरी छोर पर तरंगित हो पहुंचना, अतुलनीय आनंद से शरीर और मन को भर देता है। लोगों को कहना है कि संगम में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं, इस बात का भले ही कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न हो परंतु इतना तो निश्चित है कि भले कुछ क्षणों के लिए ही लेकिन मन धवल, स्वच्छ हो जाता है और शरीर का रोम रोम हर्ष की अनुभूति करता है। जल की शीतलता अंदर तक महसूस होती है और छोटे-मोटे कष्ट, छोटी-मोटी शारीरिक पीड़ा का कुछ भी पता नहीं चलता है।

स्नान संपन्न होते होते पूर्णिमा का चाँद आकाश में ऊपर उठ आया था। संध्या का धुंधलका और निर्मल चंद्र छवि पुरे परिदृश्य को रोमांचित कर रही थी।

नाव में वापसी के समय अंतरमन इस सोच में पड़ गया कि आखिर इस स्नान में ऐसा क्या है जो आत्मा को अभिभूत किये जाता हैं।

ऐसा लगा कि शायद तट पर पवित्र स्नान हेतु उमडा अपार जन समूह, छोटे छोटे स्वरों से उत्पन्न निनाद, माघ की ठंडी बयार में आँखों के सामने गंगा जी की धवल सी जलधारा का सांवली सी यमुना से मिलन, किसी भी व्यक्ति की आध्यात्मिक चेतना को मुखर कर देता है।

परंतु यह चेतना व्यक्ति को स्वयं में नहीं लीन नहीं करती अपितु प्रगल्भित व सक्रिय कर देती है।  व्यक्ति का अवचेतन सभी सांसारिक प्रसंगों से, संगम से इतर अन्य बातों से मुक्त हो चला होता है। भले ही कुछ क्षणों के लिए ही। ऐसे अवसर पर मानस पटल पर जो आनंद उतरता है वह अनिर्वचनीय हैं।

ऐसा लगता हैं कि असंख्य मानव मन से सम रूप में उठी तरंगों में, माघ की ऋतु व नदी की जलधारा में उत्पन्न वातावरण में जाने अनजाने शायद कुछ क्षणों के लिए ही हमारे अंदर समाधि घटित होती है। जन प्रवाह के इस विशालतम स्वरूप में, संगम की जल राशि में सामूहिक स्नान में सामूहिक समाधि घटित होती हैं।

इसी कारण शायद व्यक्ति संगम से कुछ ऐसा लेकर लौटता है जिसको जाने बिना भी अंतस प्रफुल्लित और संतुष्ट होता हैं। यात्रा के कष्ट मायने नहीं रखते।

शायद इसीलिए यह है दिव्य कुंभ- महा कुंभ

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प्रियदर्शी प्रतीक
12.02.2025
प्रयागराज- काशी

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