नज़्म मोहब्बत और रुसवाई

मोहब्बत की सड़क पर तुम भी मै भी 
हर खुशी औ रंज-ओ-गम के हमसफर भी

फिर क्यों भला हर मोड़ पर कतरा रहे हो
उलझनों से इस कदर घबरा रहे हो

हैं मोहब्बत तब तो उलझन भी रहेगी
दिल में धड़कन, साथ तड़पन भी रहेगी

सच्चे आशिक़ को क़ज़ा का खौफ कैसा
प्रेमी का हो साथ जब तौफीक जैसा

गर दुनियावी रस्मों रिवाजों के पार जाओगे
(तो ही) माशूक की बाहों में नजात पाओगे

जब खौफ के साये में बसर करना है
फिर क्यू भला मोहब्बत का सफर करना है

जब तेरा अरमान ही, मेरे प्यार को रुसवा करना
किस हौसले किस दम फिर प्यार का दम भरना

घुट घुट कर जब तिल तिल के ही हमें जीना है
मेरे महबूब मुझे जीना नहीं मोहब्बत के लिए मरना है।।
मेरे महबूब मुझे जीना नहीं मोहब्बत के लिए मरना है।।

---- ----

प्रियदर्शी प्रतीक
21.11.2025
डुमरांव, बक्सर 

(मित्र कवि नीरज के दर्द से प्रेरित)

Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru