नुक्कड़ नाटक: प्लास्टिक से दूरी -ना रहे मजबूरी
दृश्य 1 : The Plastic Habit – “Ek Baar Ka Nasha!”
(बाज़ार का दृश्य। बच्चे प्लास्टिक बोतलें खरीदते जा रहे हैं। खाली बोतलें फेंकी जा रही हैं।)
Narrator: सृष्टि का नियम है जो जन्म लेता है उसे मरना भी होता है। सब इसी जल, वायु, आकाश, अग्नि व भूमि से बनते हैं और मरकर इसी में विलीन हो जाते हैं।
एक बच्चा (उत्साहित लेकिन अनजान): सब का मतलब क्या हुआ आदमी जानवर पेड़ पौधे और सामान भी!!!!
Narrator: हा सब कुछ। यह प्रकृति का नियम है।
एक बच्चा हंसते हुए, हाथ में प्लास्टिक पानी की बोतल लिए—
इसका मतलब इंसान ने प्रकृति पर जीत हासिल कर ली। इंसान ने ऐसा कुछ बना दिया जो जन्म-जन्मांतर तक नहीं समाप्त होता। वैसे का वैसा बना रहता है। यह प्लास्टिक...हंसता है hahaha
सभी बच्चे आश्चर्य में है।
Narrator: हंसता है hahahah
बच्चे तूने दूसरा नियम तो सुना ही नहीं। जो नहीं मरता, वैसा का वैसा बना रहता है वही इस प्रकृति का, इस सभ्यता का, इस समाज के विनाश का कारण बनता है।
फिर हंसता है hahaha
ये देखो---
(बच्चे एक एक करके हाथों में पोस्टर लेकर गुजरते है जिसमें प्लास्टिक के कारण हुई त्रासदी की फोटो है। और एक एक करके जोर जोर से प्लास्टिक के कारण हुई समस्याओं को बोलते है।)
पहला बच्चा कहता है:
"क्या प्लास्टिक है हमारी मजबूरी,
क्या हम नहीं बना सकते दूरी??"
दूसरा बच्चा आकर प्लास्टिक बोतल लिए बच्चे से बोतल मांगते कर उसको मेटल बोतल देकर कहता है----
"मनुष्य ने किए हैं बड़े-बड़े पराक्रम,
प्लास्टिक में नहीं इतना दम।
कि मानव को कर दे मजबूर, उसके सुंदर भविष्य से दूर।।"
सब बच्चे मिलके:
" तो आओ हम सभी मिलकर वचन उठाएं,
प्लास्टिक को अपनी जिंदगी से कर दें-- टाटा बाय बाय"
सभी बच्चे मेटल बोतल उठाकर:
सुनो सुनो और जागो सब,
पास आओ मत भागो सब,
बातों में है दम - बोलो वंदे मातरम,
जीने का ढंग - सिखलाते है हम
प्लास्टिक हो खत्म - वंदे मातरम
बोलो वंदे मातरम - वंदे मातरम
(सब मेटल बोतल निकालते हैं, कपड़े के बैग उठाते हैं, ताली बजाते हैं)
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प्रियदर्शी प्रतीक
डुमरांव
15.11.2025
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