बैंकिंग में हिंदी: अनिवार्यता या आवश्यकता
भाषा न सिर्फ सम्प्रेषण का माध्यम है अपितु विचारों की संवाहक और संग्राहक भी है। व्यक्ति को व्यक्ति से, समाज को समाज से न सिर्फ जोड़ने बल्कि तोड़ने में भी भाषा की भूमिका रही है। भाषा की शक्ति की सीमाओं को समझने के लिये, राम मनोहर लोहिया की यह बात प्रासंगिक है कि सदियों से मनुष्य ने अपनी सम्प्रभुता को स्थापित करने के लिये, स्वयं को अन्य से अलग दिखाने के लिये जिन कारको का प्रयोग किया है वे हैं:- भाषा, भवन और भूषा। जिनमे भाषा सर्वाधिक शक्तिशाली रही है फिर वो चाहे पाली, प्राकृत, संस्कृत, फारसी या अंग्रेजी रही हो।
औपनिवेशिक काल से ही हमारे यहां जो धारा बह रही है उसमें अंग्रेजी हमारे काम काज, राज काज और ज्ञानार्जन की भाषा बन गयी है। संविधान निर्माताओं ने स्व भाषा का महत्व समझा और हमारे संविधान में हिंदी को राज भाषा का दर्जा देकर उसके प्रचार प्रसार और व्यवहार हेतु आबश्यक उपबंध किये। इन उपबंधों के अंतर्गत ही वो नियम भी बने जिनके फलस्वरूप बैंको में हिंदी के प्रयोग और प्रसार हेतु कार्य हुए।
आज के विषय "बैंकिंग में हिंदी: अनिवार्यता या आवश्यकता" में अनिवार्यता इन्हीं प्रावधानों को इंगित करती है।किसी प्रतिष्ठान, शक्ति या राज्य द्वारा किसी विषय को प्रावधानों के तहत लागू करवाना अनिवार्यता के अंतर्गत समझा जाना चाहिए, जैसा कि बैंको के प्रारंभिक चरणों मे राजभाषा अधिनियम और राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के तत्वावधान में हुआ।
परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में, जब यह भलीभांति सिद्ध है कि किसी समाज या राष्ट्र के आर्थिक जगत की धुरी उस देश की बैंकिंग व्यवस्था है। और बैंकिंग व्यवस्था की शक्ति उसके विस्तृत मजबूत आधार पर निर्भर करती है। यह आधार जन से जुड़ाव से विस्तृत होता है।
जन से जुड़ाव में भाषा की भूमिका निर्धारित है। भाषा कारोबार की माध्यम होती है। कारोबार तभी विस्तृत होगा जब भाषायी अवरोध न हो। फिर बैंकिंग तो सेवा का क्षेत्र है जहाँ लाभार्थी से भाषायी जुड़ाव अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में यह बैंकिंग का सत्य है कि हिंदी के प्रयोग से ग्राहकों की अपेक्षित सेवायें सहज और सुलभ तरीके से प्रदान की जा सकती है।
भारतीय जनता में वित्तीय साक्षरता की कमी को क्या भाषायी दुर्गमता से जोड़कर नही देखा जाना चाहिए?
ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकारों का वर्चस्व कहीं न कही बैंकिंग की जटिल प्रक्रिया व भाषायी अवरोध से जुड़ा हुआ नही है?
ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकारों का वर्चस्व कहीं न कही बैंकिंग की जटिल प्रक्रिया व भाषायी अवरोध से जुड़ा हुआ नही है?
अगर आपको लगता है, नही!!!
तो इस बात पर गौर फरमाइए कि विगत वर्षों में कम्प्यूटर से हिंदी की सहजता बढ़ने के साथ ही, वितीय उत्पादों से जुड़ी सामग्री हिंदी भाषा मे सहजता से उपलब्ध हुई है। वित्तीय उत्पादन से संबंधित सामग्री सहायता से हिंदी भाषा में उपलब्ध होने लगी है रिजर्व बैंक के अनुदेश हिंदी में उपलब्ध है ऐसे कई कारणों से वित्तीय साक्षरता बढ़ी है। साहूकारों का वर्चस्व कम हुआ है।
हम देख सकते हैं कि अपने आधार को विकसित करने के लिए किस प्रकार से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अंग्रेजीयत का चोला उतार फेंका है हिंदी को अपनाया हो चाहे कोलगेट हो या कोकाकोला,
आज के दौर में चाहे वित्तीय समावेशन का प्रश्न हो या वित्तीय साक्षरता का या कारोबार बढ़ाने का प्रश्न, हिंदी एक आवश्यकता है।
अंत में एक उदाहरण से समझाना चाहूंगा यदि भारत सरकार की बहू प्रशिक्षित बहु प्रचारित "जनधन योजना" का नाम People Money Plan होता या इसके प्रचार में "मेरा खाता भाग्य विधाता" जैसे नारों की जगह "Your Account Your Destiny" जैसे नारे होते तो क्या इस योजना का वह विराट स्वरूप हो पाता जो हम आज देख रहे हैं!!! वित्तीय समावेशन की आकांक्षा पुष्पित-पल्लवित हो सकती, जैसी हुई है।
तो अंत में हम कह सकते हैं बैंकिंग में हिंदी अनिवार्यता कभी रही होगी आज तो वह एक आवश्यकता है। धन्यवाद
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