धर्म का लोप, सामाजिक मूल्यों का क्षरण: धर्मनिरपेक्षता का दंश
औपनिवेशिक शासन के समाप्त होने के बाद जिस संकल्पना ने हमारे सामाजिक व राजनीतिक जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वह है धर्मनिरपेक्षता।
धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधानिक ढांचे के विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी की तरह नजर आती है हम देखते हैं इंदिरा गांधी द्वारा किए गए संविधान संशोधन में 42वें संविधान संशोधन में संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता शब्द जोड़ दिया गया। वैसे संविधान विशेषज्ञों का यह मानना रहा है कि पंथनिरपेक्षता संविधान में प्रारंभ से ही रहा है अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक पंथनिरपेक्षता के संदर्भ में नागरिकों के अधिकारों की व्याख्या करते हैं व अन्य अनुच्छेद हैं जो सरकार की बात को लेकर जवाबदेही तय करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णय में पंथनिरपेक्षता के संदर्भ में बातें कही हैं। एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार का मामला इस तरह का पहला मामला रहा है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को संविधान का आवश्यक ढांचा करार दिया है। इन बातों से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए और होगी भी नहीं क्योंकि जो बातें किसी के विरोध में नहीं होती जो तटस्थ होती हैं उनकी कोई भी आलोचना नहीं की जा सकती परंतु किसी कवि ने कहा है जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।।
पंथनिरपेक्षता का आशय यह है कि शासन के मामले में पंथ को ध्यान में रखते हुए कोई नीति नहीं बनाई जाएगी। पंथ आधारित कोई व्यवस्था नहीं होगी। हर नागरिक चाहे वह किसी भी पंथ को, धर्म को स्वीकार करता है उसके अधिकार अन्य नागरिकों से अलग नहीं होंगे। यह सारी बातें अपनी जगह बिल्कुल ठीक है, ऐसा होना चाहिए। पर भारत में हम धर्मनिरपेक्षता को जिस संदर्भ में आज देखते हैं यह वह नहीं है जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में या विभिन्न विद्वानों की टीकाओं में, विचारों में दिखाई पड़ती रही है।
मानव का इतिहास कई मोड़ लेते हुए ऐसे रास्तों पर आया है, जो धार्मिक रहे हैं। कुछ ऐसे पंथ बने, समूह बने, समुदाय बने, उन्होंने जीवन जीने की रीति-नीति कलाएं निर्धारित की स्थापित की, जो आगे चलकर धर्म के रूप में जानी गई है।
यह बात बिल्कुल सत्य है हर व्यक्ति विचारक नहीं हो सकता है। हर व्यक्ति से अपेक्षा करना कि वह नीतियों से सिद्धांतों से तुलना करके अपने कार्य को करेगा, बहुत हद तक ज्यादती होगी। इतिहास इस बात का गवाह है कि विचारक लाखों में कोई एक हुए हैं और उनके विचारों ने एक मशाल की तरह मानव जाति के पथ को आलोकित किया है। फिर वह चाहे शंकराचार्य रहे हो, मोहम्मद साहब रहे, जीसस क्राइस्ट हो, महात्मा बुद्ध, महावीर हो कनफ्यूसियस हो या नव धर्म सर्जन का मार्ग दिखलाने वाले कोई महात्मन। ये मानव इतिहास में गिनती के लोग रहे है जिनकी दिखाई राह को लोगो ने अपनाया है।
परंतु अभी तक यह कभी दिखाई नही पड़ा कि कोई समाज या राष्ट्र बिल्कुल ही धर्म रीति नीति से अलग होकर आगे बढ़ा हो। वर्तमान अमेरिका व यूरोपियन राष्ट्रों में हम देखते हैं लोकतंत्र बहुत अच्छे तरीके से स्थापित है परंतु इन लोकतंत्रों में भी धार्मिक कलेवर नजर आता है। अमेरिका का राष्ट्रपति आज भी बाइबल पर हाथ रखकर शपथ लेता है और इसमें किसी को किसी भी तरह की आपत्ति नजर नहीं आती। परंतु भारत में धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना ने जिस तरीके से हमारे जीवन को प्रभावित किया है उसके बारे में विचार करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि उसके तहत वन्देमातरम पर आपत्ति होती है, राष्ट्रगान पर आपत्ति होती है, राजधानी एक्सप्रेस में "वैष्णव जन तो तेने कहिये" के बजने पर आपत्ति होती है।
विगत 25 वर्षों को यदि आधार माने तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर प्राचीन संकल्पनाओं पर प्राचीन आस्थाओं पर सामाजिक रीति रिवाजों पर समय-समय पर इस प्रकार की चोट की गई कि सब कुछ छिन्न भिन्न हो गया है। आज भारतीय नागरिक बहुत सी धार्मिक चीजों से अलहदा होकर अपने आप को अपने जीवन को आगे बढ़ा रहा है, जीवन में सुख और स्वार्थ इस हद तक अवस्थापित हो गया है, कि व्यक्ति सामाजिक त्याग और मर्यादा को भूलता जा रहा है।
यदि रामायण में शबरी के किरदार को देखे और समझे तो पाएंगे कि धार्मिक भक्ति भावना से ओतप्रोत एक बूढ़ी औरत किस प्रकार संतुष्टि से, प्रेम से,भक्ति से अपने जीवन को आह्लादित कर रही है। आज के नजरिए से इसको देखा जाए तो लोग इसमें तरह-तरह की बातें जोड़ देंगे यथा जातिगत उत्पीड़न,जीवन का निरर्थक होना इत्यादि इत्यादि। परंतु क्या ऐसा था???
आजकल हमारे आसपास इस तरह की बातों का नितांत अभाव है जो हमें भक्ति की, प्रेम की, सत्य की शिक्षा देती हो। बाजारीकरण के इस दौर में सब कुछ बाजार हो चुका है या बाजार बनने को तैयार बैठा है। मदर्स डे मनाया जाता है, उसके कुछ दिनों बाद WhatsApp पर चुटकुले आते हैं जिसमें तस्वीर होती है कि मदर्स डे पर हर कोई अपनी मां के साथ सेल्फी ले रहा है लेकिन बाकी दिनों मां अकेली बैठी दीवार को निहार रही है। पारिवारिक रिश्ते कमजोर हुए हैं, पाप पुण्य की सोच को सतही और अंधविश्वास से जुड़ा और आधारहीन दिखाया गया है।
एक दृष्टि से, इनके पीछे कहीं न कहीं यह धर्मनिरपेक्षता है जिसने शासन को इस प्रकार से कमजोर कर दिया कि वह अपनी आधारभूत उन्नत संस्कृति के मूल तत्वों को भी प्रचारित और प्रसारित नहीं कर पा रही है। यह बात हमे माननी ही पड़ेगी कि कितनी भी व्यक्तिगत और सामाजिक प्रयास कर लिए जाएं जब तक उनमें शासकीय कलेवर नहीं आ जाता उसका प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता है। बिना शासकीय प्रश्रय के सांस्कृतिक उन्नति सम्भव नही है। इसका सीधा कारण है। किसी भी सभ्यता में, उसी संस्कृति के उन्नत होने के पीछे शासकीय प्रश्रय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वही आजकल की परिस्थितियों बाजारीकरण बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन इत्यादि के प्रभाव को ध्यान में रखा जाए तो हम देखते हैं मनुष्य की व्यवहारिक बुद्धि पर व्यवसायिक बुद्धि की विजय हो रही है। दया, धर्म, मित्रता, त्याग इत्यादि का इस तरह कमतर दिखाने का रिवाज हो चला है कि इनका सामाजिक जीवन से लोप होता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा इस स्तर पर आ चुकी है कि हर रिश्ते से मिठास कम होती जा रही है।
ऐसा लगता है कि आज के युग में संबंध नहीं होते, समीकरण होते हैं। यदि समीकरण ठीक हैं तो संबंध सुमधुर होते हैं। समीकरण गड़बड़ हुए तो संबंधों का अस्तित्व नहीं रह जाता।
आजकल युवाओं में रोडीज नाम का एक सीरियल बहुत लोकप्रिय है। इसके कथानक को, परिकल्पना को, प्रणाली को विचार में रखें तो समझ मे आएगा कि इस कथानक से, इस परिकल्पना से, क्या समझाना चाहते हैं, क्या उपदेश दे रहे हैं? रोडीज MTV का बहुप्रशंसित कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में कुछ गैंग लीडर होते हैं और बाकी युवाओं की एक टीम होती है इनके बीच में आपसी क्रियाकलाप व खेल होते है। इस खेल में लाभ के नियम समय-समय पर बदलते रहते है, फिर आपस में यह वोट आउट करते है, जिसमें से उनमें बाकी सब मिलकर किसी एक को बाहर निकालते है। अंत में जो बचा रह जाता है, वही विजेता घोषित होता है। यह सीरियल अपने हर एक एपिसोड में यह दिखाता है के मित्रता, सद्भावना, दया इत्यादि का प्रोफेशनल रिश्तो में कोई महत्व नहीं होता है। यह सारी चीजें व्यक्ति को कमजोर करती है, वही जीतता है, सफल होता है जो योग्य तो हो परंतु दया मित्रता सद्भावना आदि से कमजोर ना होता हो। इस सीरियल की सोच मुझे बहुत विचलित करती है।
ऐसे ही विभिन्न चैनलों पर जो डेली सोप (प्रतिदिन प्रसारित होने वाले धारावाहिक) आते है। उनकी कहानियों पर नजर डाली जाए, तो यह सब एक दूसरे के प्रति वैमनस्य घृणा लालच प्रतिशोध इत्यादि से जुड़ी हुई भावनाओं की कहानियां कहती है। ऐसी दशा में यह समाज किस ओर जाएगा, क्या सीखेगा, यह सोच कर मन भारी हो जाता है।
मुझे लगता है बहुत हद तक यह धर्मनिरपेक्षता नामक दानव इसके लिए जिम्मेदार है, जिसने शासन के सामने ऐसी मुश्किल खड़ी कर दी है कि वह अपनी संस्कृति की, समाज की अच्छी चीजों को सामने रखने पर उदाहरण प्रस्तुत कर नहीं पा रहा है। धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक सिद्धांत के रूप में किसी हद तक ठीक कही जा सकती है; परंतु समाज के लिए यह अत्यंत घातक है। उदाहरण के तौर पर, आज से 20-25 साल पहले के समाज पर नजर डालें तो कहीं ना कहीं लोगों के मुंह से सुनने को मिल जाता था कि ऐसा मत करो पाप लगेगा, ऐसे मत बोलो पाप लगेगा इत्यादि। आज व्यवसायीकरण,बाजारीकरण, पश्चिमीकरण ने लोगों की बुद्धि खोलने के नाम पर, उन्हें मॉडर्न बनाने के नाम पर जो खेल खेला है, उसका परिणाम है कि लोग पाप-पुण्य का भेद भूलने लगे हैं। लोग दूसरे के दर्द का आनंद लेते हैं, अत्याचार सामूहिक होने लगे है।
हमारी सभ्यता में धार्मिक सोच को सामाजिक ताने-बाने में इस प्रकार से गुंथा गया था कि समाज में कुरीति को, अनाचार को रोकने की स्वयं स्फूर्त शक्ति होती थी। मध्यकालीन भारत की अव्यवस्थाओं और औपनिवेशिक शासन की धूर्त्तता ने भारत के सामाजिक सांस्कृतिक विकास को तहस नहस कर दिया था। आजादी के बाद इस दिशा में होने वाले किसी भी प्रयास को, धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना हतोत्साहित करती दिखाई पड़ती है। जैसे कि हमने देखा जब संस्कृत भाषा को पाठ्यक्रम में लाने का प्रयास करने पर विरोध हुआ। परन्तु वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को देखने के बाद भी यदि शासन संस्कृति के मूल्यों की संस्थापना को उद्यत नही होता है और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बैठा रहता है तो इसे कुछ और नही बल्कि शासन की शानदार निष्क्रियता ही कहा जायेगा।
धन्यवाद
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