पवित्रता, ब्रह्मचर्य, प्रेम और परमात्मा

ब्रह्मा बाबा ने अपनी मुरली में एवं गुरुश्री ने इस बात पर ने भी समय-समय पर पवित्रता और ब्रह्मचर्य पर बहुत जोर दिया है। मैं सोचता हूँ कि क्या पवित्रता को स्वच्छता से मिला कर नहीं देख सकते? परन्तु लगता है कि स्वच्छता में जब ब्रह्मचर्य जुड़ जाता होगा तब पवित्रता उदित होती होगी। स्वच्छता से यहां संदर्भ सिर्फ शारीरिक स्वच्छता का नहीं बल्कि मानसिक स्वच्छता का भी है।

ब्रम्हचर्य की महत्ता आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में बहुत प्रकार से बखानी और बताई गई है। यदि व्यक्ति, ब्रम्हचर्य का पूरी तरीके से अनुपालन नहीं कर पाता है। तो इसके दो कारण हो सकते है। पहला यह कि अभी व्यक्ति काम विकार के प्रभाव में है। दूसरा यह कि वह प्रेम की उस तल पर है जिसे हम जिस्मानी या शारीरिक कह सकते हैं। ऐसे में वह पूरी तरह अपने प्रेम का परमात्मा के आगे समर्पण नहीं कर सकता। कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार से, प्रेम की भावना व्यक्ति के मन में, काम से प्रभावित होकर उत्पन्न हो रही है। ऐसी स्थिति में परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की गुंजाइश नहीं रह जाती है।

कबीर दास ने कहा था "प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई ना समाए"। प्रेम वास्तविक अर्थ में और पूर्णरूपेण एक समय में एक व्यक्ति से ही हो सकता है। तो वह प्रेम, यदि व्यक्ति परमात्मा पर अर्पित कर दे रहा है। तब इस बात की संभावना नहीं बचती कि वह किसी और से, किसी और पर प्रेम पूर्वक समर्पित हो सके। और यदि वह प्रेम, वह भावना किसी व्यक्ति या देहधारी पर समर्पित हो रही है तो उसका परमात्मा से एकरस होना कठिन हो जाता है।

आजकल platonic love भी एक प्रचलित टर्मिनोलॉजी है। platonic love का मतलब दो व्यक्ति एक दूसरे के प्रेम में पूरी तरह से पागल है। पूर्ण रूप से प्रेम में है। परंतु इस प्रेम को बने रहने के लिए उन्हें शारीरिक तल पर उतरने की आवश्यकता नहीं पड़ती। परमात्मा से प्रेम को मैं प्लेटोनिक लव से जोड़कर देख पाता हूँ। यह प्रेम अन्य तरीके से मानव के मन में उत्पन्न होने वाले प्रेम में आने वाली सभी प्रकार की विकृति और विकारों से बचा रहता है।

90 के दशक में शाहरुख खान और यश चोपड़ा के बैनर की रोमांटिक फिल्में देखकर बड़े होने वाली पीढ़ी के मन में जो विचार सबसे ज्यादा उथल पुथल मचाता रहा है। वह विचार प्रेम से जुड़ा हुआ है। फिल्मों ने, उपन्यासों ने, कहानियों ने कहीं न कहीं युवा मन को यह समझाया कि सच्चा प्यार ऐसी चीज है, जो तुम्हारे विपरीत लिंग के किसी शरीर में तुम्हें मिलेगा। और ऊपर वाले ने, खुदा ने, ईश्वर ने, God ने, भगवान ने दुनिया में कोई न कोई एक ऐसा इंसान बनाया है जो तुम्हारे सच्चे प्रेम की प्रतिपूर्ति करेगा।

इसको दिमाग में रखकर पीढ़ियां इधर-उधर भटकती रही। प्रेम की तलाश में पागल पथिक की तरह रास्ते तय करती रही लेकिन मंजिल किसी को भी नहीं मिली। क्योंकि यह अत्यंत ही सर्व सिद्ध सत्य है कि किसी भी दैहिक जीवधारी से प्रेम की वो सौगात नहीं मिल सकती जो वास्तव में प्रेम है। वह सुख नहीं मिल सकता जो परमात्मा से प्रेम में निरंतर मिलता रहता है। हां, यह बात सही है कि उस अद्वितीय प्रेम की झलक इस प्रेम में कहीं न कहीं रहती अवश्य है। और उसी की मिठास से पूरा रिश्ता मीठा बना रहता है। लेकिन संपूर्ण अर्थों में वह मिठास, वह झलक, शाश्वत या परमानेंट नहीं होती। जिस कारण प्रेम की खोज में पड़ा व्यक्ति जब देहधारियों में उसे ढूंढने का प्रयास करता है। तो उसकी तलाश कभी खत्म नहीं होती। हाँ, ठहराव अवश्य आता है। राहत भी मिलती है। भरम और भरोसा बन जाता है कि हां, मेरा सच्चा प्रेम मिल गया। लेकिन भरम टूट ही जाता है। प्रेम की सुगंधि उड़ ही जाती है। रह जाती है, दर्द भरी यादें और अविश्वास की, छल की स्मृतियाँ।

ऐसे में बाबा का वचन अत्यंत सारगर्भित और परम् सत्य है कि देहधारियों से मोह का बंधन नहीं बनने देना है। अपने आत्म तत्व को पहचानना है और परमात्मा से उसके शाश्वत संबंध को ध्यान में रखकर उसकी ध्यान-याद में डूबना है। ऐसा करने पर परमानंद की वह अनुभूति; दीर्घकालिक और  शाश्वत स्वरूप होती है जो किसी देहधारी के प्रेम में क्षणिक और यदा-कदा होती है।

!!ॐ शान्ति!!

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प्रतीक प्रियदर्शी
03.07.2022

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