आज की मुरली 19.07.2022

आज के ज्ञान वार्ता में बाबा कहते हैं कि हमें कर्म से संन्यास नहीं लेना है लेकिन विकर्मों का संन्यास लेना है। इसका अर्थ है हमें कोई भी विकर्म अर्थात बुरा कर्म, गलत कर्म नहीं करना है। 
बाबा कहते हैं सर्व दुखों से छूटने की सहज विधि है कि ड्रामा को अच्छी रीति बुद्धि में रखो। हर एक पाठ धारी को साक्षी होकर देखो तो दुखों से छूट जाएंगे कभी किसी बात का धक्का नहीं लगेगा। गुरुश्री समझाती हैं कि सभी प्रकार के दुखों से छूटने की विधि एक ही है। वह यह विधि है कि हर व्यक्ति को यह समझो कि वह इस दुनिया में अपना पार्ट अदा करने के लिए आया है। और हर व्यक्ति को यह समझते हुए देखो कि वो अपना पार्ट अदा कर रहा है। साक्षी भाव से देखो। तो इस प्रकार का भाव डेवलप कर लेने पर किसी की बात का धक्का नहीं लगेगा। कुछ ऐसा नहीं लगेगा कि उसने ऐसा क्यों कर दिया। हम यह समझ लेंगे कि यही उसका पाठ जो उसे करना था।

बाबा संन्यास को लेकर कहते हैं कि सन्यास कभी ऐसा नहीं होना चाहिए कि कर्मों से ही सन्यास हो जाए। घर बार छोड़कर जंगल में चले गए। यह तो उचित बात नहीं हुई। कर्मों से सन्यास कोई बात नहीं हुई। कर्म करना तो इस शरीर का काम है। ध्यान हमें इस बात का रखना है कि हमसे कोई भी विकर्म ना हो। हमें कर्म योगी बनना है कर्म सन्यासी नहीं। यह शरीर आर्गन है जिसमें आत्मा का मुख्य किरदार है। और इसी किरदार को अपना काम अच्छे से करना है तभी शरीर की वैल्यू रहेगी। जैसे यदि कोई बाजा बहुत अच्छा है लेकिन उसे बजाने वाला ठीक नहीं है तो बाजा कितना भी अच्छा हो उसकी उसकी वैल्यू नहीं रहती। वहीं बाजा यदि सुर में बजाया जाता है तो उसकी वैल्यू होती है। ऐसे ही शरीर चाहे कितना भी सुंदर क्यों ना हो यदि उसमें सतो प्रधान आत्मा की जगह पाप आत्मा है तो उस शरीर की वैल्यू नहीं रहती।

बाबा यहां ध्यान दिलाते हैं कि हमें भक्ति में नहीं फंस जाना है। ज्ञान से समृद्ध हो कर की गई भक्ति ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

अंत में, परमात्मा को समर्पित करते हुए, अहंकार से दूर होकर, सेवा करने वाले ही सहज योग को उपलब्ध होते हैं।

!!ॐ शांति!!

-----

प्रियदर्शी प्रतीक
19.07.2022

Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru