आज की मुरली 02.07.2022
आज के ज्ञान वार्ता में मुख्य बात यह थी कि माया से बचने के लिए हमेशा, घड़ी घड़ी अपने सच्चे प्रीतम को याद करो। प्रीतम आया है अपनी सारी प्रियतमा को साथ ले जाने के लिए। गुरुश्री ने समझाया है कि परमात्मा से आपका संबंध कुछ भी हो सकता है। जिस संबंध से आप उसको याद करोगे आप उसको अपने साथ वैसा ही महसूस करोगे। लेकिन ज्यादातर साधकों ने ईश्वर से अपना प्रेम का संबंध स्थापित किया है। ईश्वर परमात्मा ही, हम सभी का प्रीतम है और हम सभी बच्चे उसकी प्रेमिकायें हैं। गुरुश्री कहती हैं कि आप पुरुष और स्त्री के भेद में ना पड़े। पुरुष या स्त्री यह शरीर होता है। आत्माओं में ऐसा कोई भेद नहीं होता है। उन्होंने बताया है कि संगम युग में परमात्मा आते हैं अपने बच्चों को अपने साथ ले जाने के लिए और यह संगम युग चल रहा है।
मैं इसको इस नजर से देखता हूं कि माया से बचने का इससे अच्छा और कोई तरीका नहीं हो सकता। माया अर्थात पांचों विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार यह जो व्यक्ति को अपने चंगुल में लेने लगते हैं। तो ऐसे समय में ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति उसकी अनुभूति कर ही लेता है। ऐसे घड़ी में यदि हमें परमात्मा और उसका सच्चे स्वरूप अपने ध्यान में रहेगा तो विकार के भटकावे में, भटकने की संभावना बहुत कम हो जाएगी। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यह अनुभव अक्सर किया जाता है कि जब हम किसी समस्या में या उलझन में बैठकर सच्चे मन से ईश्वर से मदद मांगते हैं तो वह हमें सही रास्ता दिखलाता है। यह भी कहा जाता है कि जब भी कोई ऐसा काम करने चलो, जो सही नहीं है तो अंदर से कोई एक आवाज अवश्य आती है। कोई अंदर ऐसा होता है जो हमें वह काम करने से रोकता है। लोग कहते है कि यह अंतरात्मा की आवाज़ होती है। लेकिन विकार इतने हावी होते हैं कि हम उस पुकार को अनसुना कर देते हैं। ऐसी परिस्थिति में यदि परमात्मा की याद, हमारे मन में रहेगी तो अंतरात्मा के उस पुकार को समझना और उस पर अमल करना आसान होगा।
आगे बाबा कहते हैं कि एक भरपूरता बाहर की होती है, स्थूल वस्तुओं से, स्थूल साधनों से भरपूर, लेकिन दूसरी होती है मन की भरपूरता। जो मन से भरपूर रहता है उसके पास स्थूल वस्तु या साधन नहीं भी हो फिर भी मन भरपूर होने के कारण वे कभी अपने में कमी महसूस नहीं करेंगे।
इस बात की सत्यता में कोई भी गुंजाइश नहीं है। अक्सर हम महसूस करते हैं की सभी प्रकार से साधन संपन्न होने के बाद भी यदि मन में कोई पीड़ा है, अवसाद है, कठिनाई है तो सारे स्थूल भौतिक साधनों का सुख भी हमें सुखी नहीं कर पाता। उदाहरण के तौर पर यदि हम टेलीविजन देख रहे हैं। ढेर सारे चैनलों पर ढेर सारे प्रोग्राम अलग-अलग तरह के अलग-अलग प्रकृति के चल रहे होते हैं। लेकिन मन यदि अंदर से खुश नहीं है तो कोई भी प्रोग्राम हो, कुछ भी देखने का मन नहीं होता सिर्फ व्यक्ति चैनल बदलता रहता है।
सवाल यह उठता है कि मन भरपूर कैसे हो? इस विश्वविद्यालय में मेरे अब तक के अध्ययन और मनन का सार यह है कि:--
1. आत्मा और परमात्मा के स्वरूप की पहचान हो जाती है और परमात्मा को ध्यान में रखकर कार्य करने की प्रवृत्ति बन जाती है;
2. नियमित योग व मुरली के माध्यम से ध्यान व परमात्मा से संयोग होता है;
3. विकारों की पहचान हो जाती है और उन्हें दूर करने का प्रयास अंतर्मन में शुरू हो जाता है;
4. पवित्र होने की वृत्ति बन जाती है; और
5. गुरुश्री की कृपादृष्टि बनी रहती है;
तो मन में जो आध्यात्मिक आनंद पैदा होता है उससे ही मन भरपूर रहता है।
!! ॐ शांति!!
----
प्रियदर्शी प्रतीक
02.07.2022
Comments