आज की मुरली 09.07.2022

आज के ज्ञानवार्ता में गुरुश्री बताती हैं कि हमें एक शिव बाबा को याद रखना है किसी देहधारी को नहीं और ज्ञान के सिवाय कोई भी व्यर्थ बातें न सुननी है ना सुनानी है। उनका कहना है कि जब मिले हुए ज्ञान पर विश्वास पैदा हो गया और उसको आचरण में ले आए और उससे सुख शांति का अनुभव कर रहे, आध्यात्मिक उन्नति के सुख को महसूस कर रहे तो ऐसे में व्यर्थ बातें सुनने से कोई लाभ नहीं नहीं है। यह बातें न सिर्फ भ्रम पैदा करेंगीं बल्कि आपको मार्ग से अनावश्यक विचलित भी करेंगीं।

मुझे लगता है कि यह बात तो सही है। यदि आपको कोई काम करके खुशी मिल रही है। आप महसूस करते हैं कि जिस रास्ते पर आप चल रहे हैं वह आध्यात्मिक उन्नति का रास्ता है, पतन का रास्ता नहीं है। यह आगे अच्छे, और अच्छे स्तर पर ले जाएगा। तो ऐसी स्थिति में अनावश्यक व्यर्थ विचारों को सुनना किसी भी तरह से उचित नहीं जान पड़ता है। मुझे लगता है in this information age, "Information is source of Bliss and Curse in itself too". अलग-अलग तरह के विचार, भ्रांतियां किसी भी विषय पर फैली हुई है। कई बार विभिन्न मकसद, Hidden Agenda के तहत भी भ्रांतियां, बातें, अफवाहें उड़ाई जाती हैं। ऐसे में हर एक विचार पर, बात पर गौर करना कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ता है। वह भी उस समय जब आप अप्रतिम आनंद की अवस्था में हो।

बाबा की दूसरी बात कि तुम्हें एक शिव बाबा को ही याद करना है किसी देहधारी को नहीं। यह भी बात बिल्कुल सटीक है। कोई भी देहधारी चाहे वह कितनी भी सिद्धियां प्राप्त कर चुका हो। उसकी आत्मा कितनी भी पवित्र और शक्तिमान हो। फिर भी, वह परमपिता परमात्मा का अंश ही है या उसी से शक्तियां प्राप्त कर रहा है। तो ऐसे में कोई कारण नहीं होता कि व्यक्ति ऊर्जा के मूल स्रोत के स्थान पर तत्कालिक स्त्रोत को अपना आदर्श बनाए।

एक अत्यंत और महत्वपूर्ण बात बाबा कहते हैं कि हमें अपना ईश्वरीय बचपन नहीं भूलना है। गुरुश्री समझाती हैं कि इसका मतलब यह है कि जब हमें ज्ञान मिला, जब हमने उसे अमल में लाना शुरू किया, जब हमें उसका प्रारंभिक स्तर पर प्रभाव मिलना शुरू हुआ। तो वह जो स्तर होता है वह ईश्वरीय बचपन है। जब हम रूहानी आनंद को महसूस करना शुरू करते हैं।उसको याद रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि जब कोई चीज प्राप्त हो जाती है। तो कहीं ना कहीं उसके प्रति लगन और पुरुषार्थ कम होने लगता है। और बिना पुरुषार्थ में लगे रहे, जो सिद्धि और आनंद प्राप्त हुआ है वह बना नहीं रह सकता। इसलिए इस बात को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है कि हम किन परिस्थितियों में थे जब हम ज्ञान की तलाश में आए। और ज्ञान मिलने पर हमारे जीवन में क्या परिवर्तन हुए। यदि हम इसको ध्यान में रखेंगे तो हम कभी भी अपने मार्ग से डिगेंगे नहीं। हमारे दिमाग में अविश्वास के बादल नहीं मंडरायेंगे। क्योंकि हमें ध्यान में रहेगा वह दिन जब हम, वह परिस्थितियां जिसमें हम, इस ज्ञान की तलाश में भटकते हुए ईश्वरीय विश्वविद्यालय में आए थे।

मातेश्वरी भी कहती हैं कि परमात्मा मिला है पुरुषार्थ का मार्ग बताने के लिए अब उस मार्ग पर चल प्रैक्टिकल ईश्वरीय जीवन बनाना बस यही है सच्चा सुख।

!!ॐ शांति!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
09.07.2022

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