स्वधर्म-अशरीरी अवस्था- परमात्मा से योग: मुरली 14.07.2022
आज का ज्ञान वार्ता में बाबा इस बात से शुरुआत करते हैं कि बच्चे, तुम सब संग तोड़ मुझे एक परमपिता परमात्मा से योग लगाओ तो तुम सद्गति को प्राप्त होंगे। अंत में जैसी मति होगी वैसी ही गति मिलेगी।
गुरुश्री समझाती हैं कि संग तोड़ना है, संग छोड़ना नहीं है। संग तोड़ना अर्थात सब व्यक्तियों से जो साथ के लोग हैं, रिश्ते हैं, मित्र हैं, उनसे किसी भी प्रकार की उम्मीद, किसी भी प्रकार की अपेक्षा को तोड़ देना है, नहीं रखना है। जो भी उम्मीद है, जो भी अपेक्षा है वह सिर्फ एक परमपिता परमात्मा से ही रखनी है।
मुझे लगता है यदि इस बात को व्यक्ति अपने जीवन में धारित करले। यह धारणा बना ले तो फिर उसके लिए सारे के सारे जो दुनिया के प्रपंच है, वह हल हो जाएंगे। उसे किसी भी तरह की समस्या नहीं होगी। मैं देखता हूं कि आधी दुनिया दूसरों से अपेक्षा में परेशान है। यह अपेक्षा आवश्यक नहीं है कि सिर्फ धन की अपेक्षा हो या किसी वस्तु की अपेक्षा हो। यह अपेक्षा मान की सम्मान की प्रेम की व्यवहार की भी होती है। और अपेक्षा को ध्यान में रखकर किया गया किया गया व्यवहार कभी भी संतुलित नहीं हो सकता। उसमें एक तरफ कुछ न कुछ पाने की अपेक्षा, चाहे वह मौद्रिक रूप में हो या भावनात्मक रूप की हो, बनी रहेगी। और अपेक्षा पूरी ना होने पर हमेशा यह मन में रहेगा कि यह सौदा तो घाटे का हो गया। और घाटा होने पर फिर वही कलह, कोसना, निंदा करना, बुराई करना और मानसिक यंत्रणा का ऐसा एक चक्र शुरू हो जाता है। तो किसी से भी संग बनाये रखने का अंत दुख में ही होगा।
दूसरी बड़ी बात बाबा कहते हैं कि अपने असली स्वधर्म में टिक अशरीरी बन बाबा के देश को बाबा सहित याद करना है। साइलेंस में रहना है। इतनी महत्वपूर्ण बात है और इतने सीधे सब शब्दों में कह दी गई परंतु इसकी धारणा अत्यंत ही मुश्किल है। आत्मा के स्वधर्म को समझने में ही व्यक्ति को जीवन लग जाता है। उस स्वधर्म को समझना और उसे समझ कर विदेह रूप में जीवन जीना। अशरीरी हो जाना शरीर का कोई भान ही ना रहे। मन में कोई विचार ही ना उठे, निर्विचार हो जाना यह अत्यंत ही मुश्किल कार्य है। इसीलिए मुझे लगता है बाबा अपनी हर मुरली में यह कहते रहते हैं कि पुरुषार्थ करते रहना है। पवित्रता के साथ पुरुषार्थ करते रहना है। क्योंकि जो स्थिति हमें प्राप्त करनी है वह आसान नहीं है। वह आसानी से प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है।
बाबा कहते हैं साइलेंस में रहना है। जितने भी ज्ञानी ध्यानी और महान आत्माओं का जीवन वृत्त या उपदेश या अनुभव का सार देखने सुनने पढ़ने को मिला है। उसमें मुख्यतया यही बात रहती है कि अपने आप को शांत करना है। शांत चित्त अवस्था में ले जाना है। शांति के आनंद को महसूस करना है। सभी ने शांति में ही परमानंद का अनुभव लिया है। इस विश्व में जो आनंद शांति में है वह शोर में कदापि नहीं हो सकता। हम भले आत्मा के गुढ़ रहस्य को ना समझ सके। परंतु इतना तो हर व्यक्ति ही समझता है की पहाड़ के तले किसी नदी किनारे शांत बैठ कर नदी कि कल कल छल छल सुनने से ज्यादा आनंद दूसरा नही हो सकता।
मैंने यह महसूस किया है कि डिस्को में या किसी नाच गाने में जब भीड़ में, समूह में लोग इकट्ठा होते हैं या अकेले भी होते हैं तो भी यह माहौल बनाया जाता है कि पसंद के गाने का या संगीत का इतना शोर हो तो उसमें हम कुछ और सोच भी न सके और उसी संगीत में डूब जाए। इसी कारण डिस्को में जाना लोगों को पसंद आता है क्योंकि कुछ देर के लिए ही सही वह अपने मन की और बाकी सब बातों को भूल कर उस संगीत में डूब जाते हैं। वह संगीत जो मन को अपनी तरफ खींचता है और आसपास का माहौल बेख्याली का अनुभव कराता है। इससे उतने समय की खुशी मिलती है। परंतु कभी भी ऐसा नहीं महसूस होता कि वहां से लौटने के बाद मन शांत हो गया या आनंद की लंबी अनुभूति हुई। वह आनंद की अनुभूति सिर्फ इतनी देर के लिए होती है जब तक संगीत के बड़े शोर में, हमारे मन के अंदर का शोर या हमारे आसपास की परिस्थितियों से उपजा शोर दब जाता है।
मुझे यह भी लगता है कि व्यक्ति नशा भी इसीलिए करता है। शराब पीना हमेशा से व्यक्ति को अपनी तरफ खींचता रहा है क्योंकि वह हमारे मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर इस प्रकार से असर करता है कि हमें सारी बातें भूल जाती है। व्यक्ति अपनी उस समय की जिंदगी, उस समय की परिस्थिति, उस समय की बातों को भूल जाता है। भूल जाता है तो कुछ पल के लिए ही, कुछ समय के लिए ही वहां निर्विचार होने वाली स्थिति, शांत मन में शांति की स्थिति उत्पन्न होती है। मुझे लगता है वही वह 2 मिनट का आनंद होता है जिसके लिए व्यक्ति किसी भी प्रकार के नशे को करता है या डिस्को थेक इत्यादि में जाता है।
लेकिन परमात्मा के स्वरूप को समझने के बाद व अपने आप को, अपने स्वधर्म को जानने के बाद, जब हम ध्यान योग में उतरते हैं और ध्यान में अशरीरी अवस्था का अनुभव करना शुरू करते हैं तो वही आनंद जो अन्य तरीकों से हमें कुछ एक पल के लिए उपलब्ध होता है लंबे समय के लिए उपलब्ध होने लगता है। और इस प्रक्रिया में हम अन्य मानसिक कुविचारों, विकारों से भी मुक्त होते रहते है। ऐसे में ही आत्मा शांति के संगीत को उपलब्ध होती है।
!!ॐ शांति!!
-----
प्रियदर्शी प्रतीक
14.07.2022
Comments