पलाश : वो पास है- वो पास थी

हसरतों की आँधियाँ थी, चाहतें बेहिसाब थी
प्यार की लौ को जलाती, ख़ास वो मुलाकात थी।

छोड़ संस्कारों की रवायत, बंदिशों की इंतेहा में
तोड़ कर सब बेड़ियाँ, बैठी वो मेरे साथ थी।

चक्रमय जीवन मे चलती, बंधनों की बिसात थी
क्या जिंदगी रफ़्तार थी, या जिंदगी जज़्बात थी।

कुछ पलों का साथ, फिर उम्र भर की दूरियाँ
बेतकल्लुफ उमर ही थी, नासमझियां भी साथ थी।

उम्मीद की नैया उतारी, साज़िशों के भंवर में
दुश्वारियाँ दुनिया जहां की, प्रेमियों के साथ थी।

कठपुतलियों के हाथ क्या ! विश्वास था और आस थी
पर जीव के जीवनगति की लेखनी, विधि हाथ थी।

प्रेम की आकुलता, और सांसारिकता की विवशता
दीनता और विफलता ही प्रेमियों के हाथ थी।

दुनिया की सब रवायतों का, क़ायदों का तौर था
आँख में आँसू झरे, जब बिछुड़ने की बात थी।

हाथ छूटा, संग टूटा और दिल टुकड़े हुआ
मन हुआ था जार-जार, पर फेफड़ों में सांस थी।

हाय दिल, तू फिर से उनके सामने झूठा बना
बिछड़कर मर जायेंगे, क्या सिर्फ़ कोरी बात थी!

आस और विश्वास, सब बस शब्द बनकर रह गये
प्रेम तो अविचल रहा, पर दूरियाँ यथार्थ थी।

दिवस बीते, वर्ष बीते, काल रथ बढ़ता रहा
स्मृति; वन में अग्नि-सम खिलती हुई पलाश थी।

सौजन्यता औचित्य की, बात आयी और गयी
प्रेम की कोमल स्मृति, हर वक्त मन के पास थी।

निकला करें क्यों "प्रियदर्शी", खोज में उसकी कभी
अंतर की गहरी वेदना-सी, वो पास है- वो पास थी।

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प्रियदर्शी प्रतीक
08.09.2020


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