नायिका

जगत के क्षितिज के पार को निहारती
आवाजो की भीड़ में मौन को खंगालती
सुरमई सी आँख में स्वप्न है कई हजार
भँवरे की गुंजन को संगीत में सॅवारती

वो कामिनी कंचन सी-भरी बाल सुलभ चेष्टा से,
व्योम के व्यक्तित्व को स्वयं में उतारती,
प्रकृति के सौंदर्य का साम्य बनी नायिका,
इठलाती-दुलराती, सजती-सँवारती।।

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प्रियदर्शी प्रतीक
30.10.2020

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