क्षितिज के पार- द्वार की तलाश

क्षितिज के पार- द्वार की तलाश
आस और विश्वास
कि
यही कहीं होगा
नियंता का निवास

जगत की अठखेलियाँ
संसार की आवाज़
यहाँ आती होगी साफ़-साफ़

कठपुतलियों के नियंत्रण हेतु
बिछाए गये तारों के सिरे
होते होंगे समाप्त

तो यही से करता होगा
अभियंत्रण और नियंत्रण
जगती के यंत्रो का

तभी तो दूर देखती
क्षितिज के पार
करती द्वार को तलाश

सोचती इन तारों में
हो वो तार-जिससे बंधे हो
मानव मन के व्यवहार

हृदय की कंपन
मन की तरंग
भावनाओं की चढ़ाव-उतार

हो शायद नियंता को
ये आभास कि
मन का नही होता
यांत्रिक अभियंत्रण-नियंत्रण

कही छूट रहे हो तार
बिखर पड़े हो-निकल पड़े हो
क्षितिज के उस पार

देखती मौन हो
गुनती बार बार
करती बारम्बार
क्षितिज के उस पार-द्वार की तलाश

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प्रियदर्शी प्रतीक
30.10.2020

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